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‘कट्टरपंथी’ पूरी दुनिया के लिए ख़तरा ?

कट्टरपंथ पूरी दुनिया में  उभार पर है. फिर चाहे अमरीका और जर्मनी जैसे पश्चिमी देश हों, जहां नस्लवादी और नियो-नाज़ी आंदोलन ज़ोर पकड़ रहे हैं. या फिर, भारत-पाकिस्तान जैसे विकासशील देश, जहां हिंदू-मुस्लिम समुदायों में कट्टरपंथ की तरफ़ झुकाव बढ़ रहा है.

अमरीका में साल 2017 में शार्लोटविल की घटना हुई, जब गोरे नस्लवादियों ने दो दिन रैली करके कट्टरपंथियों को एक झंडे तले एकजुट करने की कोशिश की. वहीं, न्यूज़ीलैंड के क्राइस्टचर्च में दक्षिणपंथी नस्लवादी ने कई मुसलमानों की हत्या कर दी. इसी तरह, श्रीलंका से लेकर सीरिया और इराक़ तक मुस्लिम कट्टरपंथी अक्सर हिंसक घटनाओं के पीछे पाए गए हैं.

भारत में भी गोरक्षा के नाम पर दक्षिणपंथी सोच को बढ़ावा देने के आरोप लगते रहे हैं.

सवाल ये है कि हम तेज़ी से पांव पसारती उग्रवादी विचारधारा को कैसे रोक सकते हैं? इसके चंगुल में फंसने वालों को कैसे बचा सकते हैं?

कुछ संगठन इस दिशा में काम कर रहे हैं. वो, उग्रवादी विचारधारा से प्रभावित होने के सामाजिक पहलुओं पर ग़ौर कर रहे हैं. ताकि, जो लोग कट्टरपंथ के चंगुल से निकलना चाहते हैं, उनकी मदद की जा सके.

‘एक्ज़िट नॉर्वे’ ऐसी ही संस्था है. 1997 में नॉर्वे की पुलिस अकादमी में दो रिसर्चरों ने इसकी शुरुआत की थी. इसके तीन प्रमुख मक़सद हैंः

  1. स्थानीय स्तर पर नेटवर्क विकसित कर नस्लवादी या हिंसक समूहों से जुड़े बच्चों की मदद करना.
  2. युवाओं को इन समूहों से दूर करने में मदद करना.
  3. ऐसी जानकारी का प्रचार करना, जो युवाओं की मददगार हो.

‘एक्ज़िट नॉर्वे’ दक्षिणपंथी सोच के चंगुल में फंसने के सामाजिक पहलुओं पर ग़ौर करता है. इस जानकारी के आधार पर लोगों की मदद की जाती है. अब ये संगठन, कई यूरोपीय देशों में सक्रिय हो गया है.

ये उन लोगों के बीच काम करता है, जो अब कट्टरपंथी सोच वाले संगठनों से पीछा छुड़ाना चाहते हैं. संस्था ऐसे लोगों से ख़ुद संपर्क नहीं करती. जो लोग इसकी मदद चाहते हैं, उन्हें ही आगे आना होता है.

‘एक्ज़िट जर्मनी’ की प्रोजेक्ट मैनेजर फैबियन विचमैन कहते हैं, “हम स्वयंसेवियों के ज़रिए काम करते हैं. लोगों को हमारे पास आना होता है. उन्हें हमें फ़ोन या ई-मेल करना होता है. फिर हम ये देखते हैं कि कोई इंसान, कट्टरपंथी संगठन से दूर होने के लिए किस हद तक तैयार है. ऐसे लोगों के लिए सिर्फ़ अपने अतीत पर पर्दा डालना ज़रूरी नहीं. उन्हें पछतावा होना चाहिए और कट्टरपंथी सोच से दूर होने का उनका इरादा भी मज़बूत होना चाहिए.”

संपर्क करने वाले लोगों से बात करने के बाद संस्था, उन्हें विचारधारा के शिकंजे से दूर होने में मदद करती है. इसके लिए सामाजिक, मनोवैज्ञानिक, जज़्बाती और क़ानूनी रास्ते अपनाए जाते हैं. पूरी प्रक्रिया गोपनीय रखी जाती है. इसमें वो लोग ज़्यादा सक्रिय होते हैं, जो पहले कभी किसी कट्टरपंथी संगठन से जुड़े रह चुके होते हैं.

ज़हरीली विचारधाराएं

‘एक्ज़िट स्वीडन’ और ‘एक्ज़िट जर्मनी’ से जुड़े माइकल किमेल कहते हैं कि अक्सर कट्टरपंथी झुकाव के पीछे विचारधारा से प्रेम कारण नहीं होता. पहचान के संकट से जूझ रहे युवा ही अक्सर कट्टरपंथ की ओर झुकते हैं.

कुछ लोग ‘एक्ज़िट नॉर्वे’ की इसलिए आलोचना भी करते हैं कि वो नस्लवादी विचारधारा के ख़िलाफ़ नहीं है, जो समाज में ज़हर घोलने का काम कर रही है. लेकिन, माइकल किमेल कहते हैं कि हमारा मक़सद लोगों को ऐसी सोच से छुटकारा दिलाना है. फिर हर आज़ाद सदस्य ख़ुद ही दूसरों की मदद करेगा.

वो इसके लिए ‘एक्ज़िट स्वीडन’ से जुड़े रॉबर्ट ओरेल की मिसाल देते हैं. रॉबर्ट इन दिनों पूरी दुनिया में घूमकर ‘एक्ज़िट नॉर्वे’ प्रोजेक्ट का प्रचार कर रहे हैं, ताकि कट्टरपंथ से निपटने में मदद कर सकें.

एक वक़्त था जब रॉबर्ट ओरेल एक कट्टर दक्षिणपंथी संगठन के सदस्य थे.

रॉबर्ट किशोरावस्था से ही इस संगठन से जुड़ गए थे. उनका आत्मविश्वास हिला हुआ था. वो अक्सर लड़ाई कर लेते थे. स्वीडन की राजधानी स्टॉकहोम के रहने वाले रॉबर्ट कहते हैं, “हमारा संगठन अक्सर सड़कछाप लोगों से भिड़ता रहता था. हम क्लब से लेकर सड़क तक कहीं भी लोगों से लड़ते चलते थे.”

रॉबर्ट कहते हैं कि वो समाज से अलग-थलग महसूस करते थे. उनके जज़्बात का इस संगठन ने ख़ूब फ़ायदा उठाया.

यूरोपीय और अमरीकी दक्षिणपंथी संगठन पहले तो काले और गोरों के बीच भेद करना सिखाते हैं. गोरों को अच्छा और अश्वेतों को बुरा बताते हैं. फिर वो ईसाई और यहूदियों के बीच दीवार खड़ी करने की कोशिश करते हैं. ऐसे संगठनों के निशाने पर दूसरे देशों से आकर बसे लोग भी होते हैं. फिर वो अपने संगठन के सदस्यों को इंसानियत के ख़िलाफ़ जाकर हिंसा करना और लोगों को निशाना बनाना सिखाते हैं. ये लड़ाई हीरो बनाम विलेन की हो जाती है.

रॉबर्ट ओरेल कहते हैं कि ऐसे संगठन के सदस्य एक-दूसरे के क़रीब होते हैं. एक-दूसरे की पूरी पहचान करते हैं. इस्लामिक कट्टरपंथ के ख़िलाफ़ यूरोपीय संगठनों में काफ़ी एकजुटता देखने को मिलती है. ऐसे संगठनों से जुड़े लोग अपने साथियों के लिए जान तक देने को राज़ी हो जाते हैं.

मोह भंग की वजह

आख़िर रॉबर्ट को ऐसे संगठन को छोड़ने की क्यों सूझी?

रॉबर्ट कहते हैं कि उन्हें अपने संगठन का दोगलापन साफ़ दिखने लगा था. वो शराब पीने से लेकर कई और तरह के नशों में मुब्तिला थे. दूसरों को अनुशासन सिखाते थे और ऐसे संगठन के सदस्य ख़ुद अराजक थे.

जब रॉबर्ट ने फौज में दाख़िला लिया, तो वहां के अनुशासन से बहुत प्रभावित हुए. इसके बाद ही उन्होंने कट्टरपंथी संगठन से अलग होने का फ़ैसला किया.

उत्तरी यूरोप में कट्टरपंथी संगठनों पर किताब लिखने वाले टोर ब्योर्गो कहते हैं कि अक्सर ऐसे संगठनों से जुड़े युवाओं का मोह भंग हो जाता है. वजह ये कि संगठन जो सबक़ दूसरों को सिखाते हैं, उसका पालन ख़ुद नहीं करते. फिर, बहुत से लोग उकता जाते हैं. कई लोग हिंसा के लिए जेल जाने के बाद ऐसे संगठनों से पीछा छुड़ाना चाहते हैं. तो, कुछ लोग रोज़गार मिलने के बाद अपनी नई ज़िंदगी पर ध्यान केंद्रित करना चाहते हैं.

इसकी एक मिसाल अमरीका की सारा (काल्पनिक नाम) हैं. वो एक कट्टरपंथी संगठन की सदस्य थीं. सारा ने बताया कि उनके मां-बाप बहुत धार्मिक थे. फिर भी बड़े अनुशासनहीन रहते थे. दोनों को शराब की लत थी. पिता से तो सारा की बिल्कुल भी नहीं पटती थी. किशोरावस्था में सारा को दूसरी लड़कियों में दिलचस्पी होने लगी. इससे वो परिवार से और भी दूर हो गईं.

स्कूल में ही वो नस्लवादी सोच वाले लोगों के संपर्क में आईं. वो उनकी सदस्य बन गईं. एक बार सारा को चोरी करने के जुर्म में जेल जाना पड़ा. तब वो अपने संगठन के सदस्यों से दूर हो गईं.

जेल में उनकी दोस्ती उन समुदायों के लोगों से हुई, जिनसे उनका संगठन नफ़रत करना सिखाता था. इसके बाद सारा के ज़हन में अपने संगठन की विचारधारा को लेकर सवाल उठे. जेल में जिस तरह दूसरे समुदाय की महिलाओं ने उनकी मदद की, उससे उनके अंदर भरा ज़हर निकल गया.

जेल से बाहर आकर उन्होंने अपने नस्लवादी संगठन से पीछा छुड़ाने की कोशिश की. और आख़िर में कामयाब भी हुईं.

यानी ऐसे संगठनों से दूर होने के लिए दूरी होना ज़रूरी है. कट्टरपंथी इस्लामिक संगठनों से जुड़े लोगों के बारे में भी यही कहा जा सकता है.

ओलिवर रॉय अपनी किताब, ‘जिहाद ऐंड डेथ’ में कहते हैं कि यूरोप में हमले करने वाले इस्लामिक जिहादी विचारधारा से ज़्यादा समाज में अलग-थलग होने की वजह से कट्टरपंथी बने. वो बाग़ी बनना चाहते थे. उनको लगता था कि ऐसे हमलों से वो इस्लामिक देश की स्थापना कर लेंगे.

यूरोप के युवा मुसलमान इस्लामिक स्टेट की विचारधारा से नहीं, बल्कि उसके तौर-तरीक़ों से ज़्यादा प्रभावित हैं. उन्हें लगता है कि इस्लामिक स्टेट की मदद से ख़िलाफ़त का साम्राज्य स्थापित किया जा सकता है. जानकार इसे इस्लाम का कट्टरपंथ कहने के बजाय कट्टरपंथ का इस्लामीकरण मानते हैं.

इसके पीछे की वजह अक्सर सामाजिक होती है. हाशिए पर पड़े लोगों का झुकाव कट्टरपंथ की तरफ़ हो जाता है.

बाहर निकलने का तरीक़ा क्या है?

‘एक्ज़िट नॉर्वे’ जैसे प्रोजेक्ट इसीलिए कट्टरपंथियों के पीछे के सामाजिक पहलुओं पर ज़ोर दे रहे हैं. ताकि उनकी मदद कर सकें.

रॉबर्ट ओरेल कहते हैं कि हम विचारधारा पर बहस की बजाय लोगों को अपने ही बारे में फिर से सोचने के लिए प्रेरित करते हैं. उन्हें दुनिया को नए नज़रिए से देखने में मदद करते हैं.

फैबियन विचमैन और रॉबर्ट ओरेल ये भी कहते हैं कि आमतौर पर ये मानना कि दक्षिणपंथ तेज़ी से फैल रहा है, ग़लत है. भले ही हाल में कई हिंसक घटनाएं हुई हैं. पर, हक़ीक़त ये है कि ऐसे कट्टरपंथी संगठनों का दायरा असल में घट रहा है. मीडिया में ज़्यादा कवरेज का ये मतलब नहीं कि कट्टरपंथ बहुत तेज़ी से फैल रहा है.

ऐसे कट्टरपंथी संगठनों से निपटने के लिए ये समझना ज़रूरी है कि आख़िर लोगों का झुकाव इनकी तरफ़ क्यों हो रहा है. इसके कई पेचीदा कारण होते हैं. उन्हें समझकर हम लोगों को दक्षिणपंथी हिंसक संगठनों के शिकंजे से आज़ाद करा सकते हैं.