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जो भी इस नदी का पानी पिएगा, उसका नाश हो जाएगा…….

मध्यप्रदेश का एक जिला है इंदौर. इसमें एक तहसील है, जिसे जानापाव कहते हैं. यहां पर विंध्य की पहाड़ियां हैं. इन्हीं पहाड़ियों में जमदग्नि ऋषि का आश्रम है. इस आश्रम में एक कुंड है, जहां से कई नदियां निकलती हैं. इन्हीं नदियों में से एक नदी है चंबल. जनमानस में लोकश्रुतियां लिखित इतिहास से ज्यादा मायने रखती हैं. चंबल के लिए भी ठीक यही बात है. चंबल के उद्गम का कोई लिखित इतिहास नहीं मिलता, लेकिन इसके बारे में लोकश्रुतियां हैं. और लोकश्रुति ये है कि माहिष्मति (जिसे अब माहेश्वर कहा जाता है) का राजा था सहस्त्रबाहु. उस वक्त का सबसे ताकतवर राजा. पास के जानापाव में ऋषि जमदग्नि का आश्रम था. उनके बेटे थे परशुराम. सहस्त्रबाहु ने ऋषि जमदग्नि के आश्रम को तहस-नहस कर दिया. परशुराम को बदला लेना था. उन्होंने सहस्त्रबाहु को मार गिराया. परशुराम ने अपने पिता जमदग्नि के कहने पर अपनी मां रेणुका का वध कर दिया था. और परशुराम ने जहां अपनी मां का वध किया था, वो जानापाव ही था. यहां पर जमदग्नि ऋषि का एक कुंड है. माना जाता है कि इसी कुंड से चंबल नदी निकलती है.

इस नदी को लेकर एक और जनश्रुति है. और ये जनश्रुति महाभारत में दर्ज है. इस जनश्रुति के मुताबिक मध्यप्रदेश के मुरैना में चंबल नदी के किनारे पर शकुनि का राज था. शकुनि कौरवों के मामा थे. कौरव और पांडव के बीच जुए का खेल हुआ. इस जुए में पांडव हार गए. दांव पर उनकी पत्नी द्रौपदी थी, जिसे वो हार गए थे. इसी नदी के किनारे बसे राज में दुर्योधन के भाई दुशासन ने द्रौपदी के चीरहरण की कोशिश की थी. इसके बाद द्रौपदी ने नदी को शाप दे दिया था और कहा था कि जो भी इस नदी का पानी पिएगाा, उसका नाश हो जाएगा.

चंबल नदी मध्यप्रदेश के इंदौर से निकलती है. वहां से ये राजस्थान के कोटा-धौलपुर होते हुए फिर से ये मध्यप्रदेश में आती है और वहां से फिर ये नदी उत्तर प्रदेश में आ जाती है. यूपी के इटावा के पास ये नदी यमुना में मिल जाती है.

अब इसे लोकश्रुति का असर कहिए या फिर चंबल की बनावट, चंबल के किनारे कभी भी घनी बस्ती का इतिहास नहीं मिलता है. कोई इस नदी की पूजा भी नहीं करता है. मध्यप्रदेश से निकलकर राजस्थान होते हुए उत्तर प्रदेश के मुरैना में यमुना से मिलने के दौरान ये नदी कुल 960 किलोमीटर की यात्रा तय करती है. और इस 960 किलोमीटर की लंबाई में नदी के किनारे बस्तियां नहीं हैं. सिर्फ नदी है, उसकी गाद है और जंगल हैं. पानी खूब साफ है और आस-पास के इलाके में खेती का नामोनिशान तक नहीं है. चंबल के किनारे फैले इसी इलाके को बीहड़ कहा जाता है. बीहड़ और उसके फैलाव पर काम कर चुके प्रोफेसर विनायक तोमर कहते हैं-‘ हर साल नदी में बाढ़ आती है और हर साल बीहड़ का क्षेत्रफल बढ़ता जाता है. जो गांव चंबल से दूरी पर बसे थे, एक-एक करके वो गांव भी बीहड़ में तब्दील होते जा रहे हैं. गांव के गांव खाली होते जाते हैं और आबादी और पीछे की ओर खिसकती जाती है.’

बढ़ते बीहड़ों की वजह से विस्थापित हुए गांवों को चंबल के लोग ‘बेचिराग गांव’ कहते हैं. इन बेचिराग गांवों की संख्या हर साल बढ़ती ही जा रही है. गांव की खेती वाली ज़मीन रेतीले पठारों और पहाड़ी टीलों में तब्दील होती जा रही है. घने और कंटीले जंगल का विस्तार हो रहा है. इंडिया वाटर पोर्टल की एक खबर के मुताबिक हर साल बीहड़ के क्षेत्रफल में करीब 800 हेक्टेयर का इजाफा होता जा रहा है. इसके अलावा नदी में जब बाढ़ आती है, तो नदी कटाव करती है. आस-पास के गांवों को काटते हुए नदी का फैलाव होता जाता है और जब नदी में बाढ़ खत्म हो जाती है, तो बड़े-बड़े गड्ढे बन जाते हैं. प्रोफेसर विनायक तोमर बताते हैं- ‘जब भी कोई डकैत अपराध करके इन बीहड़ों में छुपता है, ये जंगल और बड़े-बड़े गड्ढे उसके लिए मददगार साबित होते हैं. पुलिस को कभी भी इस तरह के जंगल और गड्ढ़ों के बीच अपराधियों को खोजने की ट्रेनिंग नहीं मिली होती है.’

लेकिन इस चंबल के बीहड़ में ऐसा क्या है कि डकैत सिर्फ यहीं होते हैं. पूरे देश के अलग-अलग हिस्सों में जंगल हैं, लेकिन चंबल का इतिहास डकैतों से भरा पड़ा है. चंबल और उसकी ऐतिहासिक-भौगोलिक स्थिति को जानने वाले लोगों के पास इसे लेकर कई दिलचस्प किस्से हैं. कुछ लोग कहते हैं कि चंबल के पानी की तासीर ही इतनी गर्म है कि वो अपमान बर्दाश्त नहीं करती है और बदला लेने के लिए उकसाती है. वो लोग इसे परशुराम के क्रोध से जोड़कर देखते हैं. लेकिन इतिहासकारों के पास भी इससे जुड़े किस्से हैं. अलग-अलग इतिहासकार इस बात की तसदीक करते हैं कि चंबल के जंगल में बगावत की शुरुआत राजा भोज के जमाने से शुरू हुई है, जो अब भी जारी है. इतिहास में दर्ज है कि जब भी किसी ने सत्ता के खिलाफ बगावत की, चंबल के बीहड़ों ने उसे शरण दी है.

चंबल का इतिहास खोजने पर पता चलता है कि कभी चंबल पर वत्स गोत्र के सामंतों का कब्जा हुआ करता था. लेकिन जब दिल्ली में तोमरों का शासन खत्म हो गया तो राजा भोज ने चंबल के क्षेत्र पर भी अपना अधिकार कायम कर लिया. इसकी वजह से नाराज होकर उस वक्त के वत्स गोत्र के युवराज महासेन ने अपनी सेना के साथ चंबल के जंगल का रुख किया. उसने चंबल में रहते हुए मालवा के कारोबारियों से कर वसूलना शुरू कर दिया. कर न देने वालों से महासेन सख्ती से पेश आने लगा. लेकिन राजा भोज को ये बर्दाश्त नहीं हुआ. उन्होंने महासेन को मारने की कोशिश की, लेकिन उनके सैनिक नाकाम रहे. मज़बूरी में राजा भोज ने तोमरों से मदद मांगी, जो अपना शासन छिन जाने के बाद से बीहड़ों में बस गए थे. तोमरों ने राजा भोज के सामने शर्त रखी कि अगर चंबल का अधिकार तोमरों को दे दिया जाए, तो वो महासेन का खात्मा कर देंगे. राजा भोज मान गए. और फिर तोमरों ने महासेन को मार गिराया. लेकिन महासेन की बगावत इतिहास में दर्ज हो गई. तीन राज्यों की यात्रा के दौरान ये नदी 960 किलोमीटर लंबा सफर तय करती है.

अंग्रेजों को भी अपने शासन के दौरान चंबल की बगावत झेलनी पड़ी थी. और इस बागी का नाम था मान सिंह. साल 1935 से लेकर 1955 के बीच मानसिंह ने 1,112 डकैतियां की थीं. राठौड़ राजपूत समुदाय से ताल्लुक रखने वाले मानसिंह ने 20 साल में कुल 182 हत्याएं की थीं, जिनमें 32 तो पुलिस के अधिकारी थे. बेटे, भाई और भतीजे की बदौलत 20 साल तक चंबल के जंगलों में एकछत्र राज करने वाले मानसिंह को अंग्रेज नहीं मार पाए. आजादी के 8 साल के बाद मानसिंह को मारने के लिए सेना लगानी पड़ी और फिर 1955 में मानसिंह अपने बेटे के साथ मारा गया. राजस्थान में मानसिंह का मंदिर है, जिसे लोग पूजते हैं. यहां के लोग मानसिंह को डकैत कहने पर नाराज़ हो जाते हैं और कहते हैं कि कहना है तो बागी कहो, डकैत नहीं.

मानसिंह को चंबल के लोग भगवान की तरह पूजते थे. उसकी छवि रॉबिनहुड जैसी थी. वो अमीरों का धन लूटकर गरीबों में बांट देता था. खेरा राठौड़ इलाके में उसका मंदिर भी है, जिसकी पूजा की जाती है. किंवदंतियों की तरह मशहूर हुए मानसिंह के किस्सों पर चंबल के लोगों को गर्व है. वो इसे अपने मान सम्मान का प्रतीक मानते हैं और प्रतिशोध का परंपरागत रास्ता भी. प्रोफेसर विनायक तोमर कहते हैं-

हैं- ‘चंबल में विकास के नाम पर कुछ भी नहीं है. ढंग की सड़कें तक नहीं है कि वहां पहुंचा जा सके. शिक्षा का कोई साधन नहीं है. जो स्कूल-कॉलेज हैं, वो सिर्फ डिग्रियां देते हैं. बेरोजगारी अपने चरम पर है. और यही वजह है कि अगर कोई बागी चंबल में अपनी गैंग बनाता है, तो बड़ी तादाद में ऐसे नौजवान भी बंदूक उठाकर चंबल का रुख कर लेते हैं. कई बार कुछ डकैतों की सफलता की कहानियां सुनकर बहुत सारे नौजवान शौकिया तौर पर भी हथियार उठा लेते हैं.’