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बिहार : क़रीब 100 बच्चों की मौत हो चुकी है, और मरते बच्चों के सामने इतना बेबस क्यों है भारत ? Report……..

नरेंद्र मोदी ऐतिहासिक जनादेश के साथ एक बार फिर देश के प्रधानमंत्री बन चुके हैं. एनडीए की सरकार बनने के बाद जीडीपी और बेरोज़गारी के आकड़े जारी किए गए.

ये दोनों ही सरकार और जनता को परेशान करने वाले आंकड़े थे. अर्थव्यवस्था को पटरी पर लाना सरकार के लिए चुनौती है, लेकिन एक और चुनौती जो अभी मोदी सरकार के सामने विशालकाय आकार लिए खड़ी है और वह है देश की चरमरा चुकी स्वास्थ्य व्यवस्था.

बिहार में दिमाग़ी बुखार से क़रीब 100 बच्चों की मौत हो चुकी है. दिन ब दिन यह आंकड़ा बढ़ता जा रहा है. मीडिया रिपोर्टों में मुज़फ़्फ़रपुर की बदहाल व्यवस्था की तस्वीर पेश की जा रही है.

वहीं दूसरी तरफ़ कोलकाता में जूनियर डॉक्टरों के साथ हिंसा ने पूरे देश के डॉक्टरों को आंदोलनरत कर दिया है और एम्स जैसे संस्थानों में इलाज प्रभावित हो रहा है.

अस्पतालों की कमी, बिना डॉक्टरों का वॉर्ड, बिना प्रशिक्षण वाला स्टाफ़ और फ़ंड का बड़ा संकट. ऐसी कई और समस्याओं से जूझ रहा भारत का स्वास्थ्य क्षेत्र दशकों से दलदल में धंसता जा रहा है.

भारत दावा करता है कि जियोपॉलिटिकल सूची में देश की रैंकिंग बढ़ती जा रही है लेकिन यहां स्वास्थ्य सेवाओं की हालत उसके इस दावे को शक में दायरे में खड़ा करते हैं.

ब्रिटिश मेडिकल जर्नल की हालिया रिपोर्ट के मुताबिक़ भारत की स्वास्थ्य व्यवस्था कई गंभीर मानकों पर भी फेल साबित हुई है.

यहां डॉक्टरों की क़ाबिलियत और अस्पतालों में मिलने वाली सेवाओं की हालत बदतर हालत में है. रिपोर्ट के मुताबिक़ भारत में 54 फ़ीसदी हेल्थ प्रोफ़ेशनल यानी डॉक्टर, नर्स, चिकित्सा-सहायक और दाइयों के पास योग्यता भी नहीं है.

वहीं 20 फ़ीसदी काबिल डॉक्टर सेवा में ही नहीं हैं. 58 फ़ीसदी डॉक्टर पुरुष हैं, यानी महिलाओं की इस क्षेत्र में भागीदारी का अनुपात बेहद कम है. इतना ही नहीं सर्वे के मुताबिक़ 80 फ़ीसदी भारतीय डॉक्टर और 70 फ़ीसदी नर्स-दाइयां प्राइवेट अस्पतालों के लिए काम करना चुनती हैं.

उन्हें लगता है कि प्राइवेट अस्पताल उन्हें ज़्यादा अनुकूल माहौल दे सकते हैं.

अध्ययन के मुताबिक़, “कार्य का विभाजन और स्वास्थ्य क्षेत्र के कर्मचारियों की योग्यता भारत के लिए बेहद गंभीर संकट होता जा रहा है. नीतियां इन कर्मचारियों को बेहतर प्रशिक्षण देने पर ज़ोर देने वाली होनी चाहिए. ख़ासकर योग्य लोगों की भर्ती पर ज़ोर देना चाहिए.”

सरकारी आंकड़े भी बताते हैं स्वास्थ्य व्यवस्था खोखली है

साल 2016 के नेशनल सैंपल सर्वे में भी भारत की स्वास्थ्य व्यवस्था के खोखले होने की बात कही गई है. इस सर्वे के मुताबिक़ लगभग एक चौथाई एलोपैथिक चिकित्सक के पास ज़रूरत भर योग्यता नहीं है.

इसके साथ ही दो तिहाई डॉक्टर और नर्स शहरों में काम कर रहे हैं. वहीं ग्रामीण इलाक़ों में महज 29 फ़ीसदी लोग काम कर रहे हैं.

कई गांवों में हेल्थ प्रोफ़ेशनल के मामले में भारत कई अफ्रीकी देशों से पीछे हैं.

स्वास्थ्य सेवा पर भारत का कम खर्च सालों से जानकारों के लिए एक चिंता का विषय है. दुनिया की छठवीं सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था होने के बावजूद भारत अपनी जीडीपी का महज 1.5 फ़ीसदी ही स्वास्थ्य सेवा पर खर्च करता है, जो दुनिया के सबसे कम खर्च करने वाले देशों में से एक है.

ब्रिटेन अपनी स्वास्थ्य सेवा पर 9.6 प्रतिशत और अमरीका जीडीपी का 18 प्रतिशत हिस्सा ख़र्च करता है.

भारत ने अपने अंतरिम बजट में रक्षा के लिए जीडीपी का 10.6 प्रतिशत ख़र्च करने की बात कही जो स्वास्थ्य के मुकाबले पांच गुना ज़्यादा है.

आलोचक मानते हैं कि इस स्थिति को सुधारना बेहद ज़रूरी है.

11 हज़ार पर एक डॉक्टर

हालांकि सरकार ने स्वास्थ्य के क्षेत्र में प्रति व्यक्ति खर्च बढ़ाया है. 2018 में सरकार द्वारा जारी नेशनल हेल्थ प्रोफाइल के मुताबिक 2009-10 में एक व्यक्ति पर सरकार जहां 10 डॉलर खर्च करती थी, वहीं 2015-16 में यह बढ़ा कर 15 डॉलर कर दिया गया.

इसके बावजूद यह बहुत अच्छा नहीं समझा जाता है.

भारत में स्वास्थ्य की स्थिति ऐसे समझी जा सकती है कि औसतन एक डॉक्टर पर करीब 11 हज़ार की जनसंख्या आश्रित हैं जबकि WHO के तय मानकों से 10 गुना अधिक है.

WHO अनुशंसा करता है कि डॉक्टर-जनसंख्या का अनुपात 1: 1,000 होना चाहिए.

इतनी ख़राब स्थिति के बावजूद चरमराती स्वास्थ्य व्यवस्था का मुद्दा सरकारों के एजेंडे में शीर्ष पर नहीं है. हाल ही में हुए लोकसभा चुनावों में भी इस मुद्दे पर बहुत चर्चा नहीं हुई.

2014 के चुनावों के दौरान भारतीय जनता पार्टी ने स्वास्थ्य और शिक्षा पर बदलाव लाने की बात कही थी, लेकिन पांच सालों में बहुत बदलाव नहीं दिखा.

भारत में आज भी बेहतर स्वास्थ्य सेवा औसत कमाई करने वाले लोगों से दूर है.

साल 2017 में भाजपा सरकार ने यह वादा किया था कि 2025 तक देश की कुल जीडीपी का 2.5 प्रतिशत स्वास्थ्य बजट पर खर्च किया जाएगा.

इसने दुनिया की सबसे बड़ी स्वास्थ्य योजना अयुष्मान भारत लॉन्च की. यह वास्तव में देश के ग़रीब लोगों के लिए हेल्थ इंश्योरेंस स्कीम है. इसके तहत देश के 10 करोड़ परिवारों को सालाना 5 लाख रुपए का स्वास्थ्य बीमा मिल रहा है.

2011 की जनगणना के हिसाब से ग्रामीण इलाके के 8.03 करोड़ परिवार और शहरी इलाके के 2.33 करोड़ परिवार आयुष्मान भारत योजना के दायरे में आएंगे.

इस तरह इस योजना के तहत 50 करोड़ लोगों को फ़ायदा पहुंचाने की बात कही गई है. वहीं, इस योजना से 70 करोड़ से ज़्यादा लोगों को बाहर रखा गया है.

वास्तव में सरकार ने चुनावों के दौरान जिस आयुष्मान भारत योजना को मास्टरस्ट्रोक बताया था वो कोई सरकारी स्वास्थ्य कार्यक्रम नहीं बल्कि स्वास्थ्य बीमा है.

खर्चीला इलाज

भारत में दवाओं की क़ीमत दुनिया के अन्य देशों के मुकाबले कहीं अधिक है. भारत में पूरे स्वास्थ्य खर्च का 70 फ़ीसदी हिस्सा मरीज़ ख़ुद वहन करते हैं, जो दुनिया में सबसे अधिक है.

देश में स्वास्थ्य जांच भी एक बड़ी समस्या है. 2018 में जारी सरकारी आंकड़ों के मुताबिक भारत में 70 फ़ीसदी कैंसर का पता तब चलता है जब यह स्टेज III या IV में पहुंच जाता है.

ऐसे में कैंसर का इस स्टेज पर इलाज करना खर्चीला और मरीज़ को ख़तरे से निकालना मुश्किल हो जाता है.

भारत में कैंसर से होने वाली मौतों की संख्या दुनिया में सबसे ज़्यादा है. नेशनल इंस्टिट्यूट ऑफ कैंसर प्रिवेंशन एंड रिसर्च के मुताबिक पिछले साल 7.84 लाख लोग कैंसर के शिकार हुए थे.

स्वास्थ्य विशेषज्ञों के मुताबिक कैंसर के इलाज का खर्च भारत में इतना अधिक है कि आम या ग़रीब लोग इसका इलाज बीच में ही छोड़ देते हैं.

स्वास्थ्य बजट बढ़ाई जाए

सही कहा जाए तो केंद्र और राज्य सरकारों ने स्वास्थ्य क्षेत्र में नई सोच की मदद से सुधार लाने की कोशिश की है जिनके मिश्रित नतीजे सामने आए हैं.

इन कोशिशों में प्रधानमंत्री जन औषधि केंद्र योजना शामिल है. इस योजना के तहत ग़रीब और मध्य-वर्गीय परिवारों को कम क़ीमतों पर ज़रूरी दवाएं, घुटने के इंप्लांट और कार्डिएक स्टेंट्स जैसी चीज़ें उपलब्ध कराई जा रही हैं.

इसके साथ ही साथ आयुष्मान भारत के तहत डेढ़ लाख स्वास्थ्य और कल्याण केंद्र खोले जाने की प्रक्रिया जारी है. ये केंद्र सामान्य बीमारियों के निवारण के लिए समुदाय के स्तर पर काम करेंगे.

लेकिन आलोचकों ने इस योजना पर सवाल उठाते हुए कहा है कि इस समय असली ज़रूरत आयुष्मान भारत के तहत कोष को बढ़ाया जाना चाहिए.

चूंकि ये एक ऐसी योजना है जो कि सभी दूसरी स्वास्थ्य योजनाओं को आपस में मिलाती है, ऐसे में सरकार को अगले पांच सालों तक हर साल इसका कोष 20-25 फीसदी बढ़ाना चाहिए ताकि ये अपने लक्ष्य को हासिल कर सके.

बीमारी का लोगों की कार्यक्षमता पर क्या असर होता है, इसे लेकर स्थिति साफ़ है.

अगर वैश्विक आंकड़ों को देखें तो भारतीय सिर्फ़ साढ़े छह साल अपनी उत्पादकता के चरम पर रहते हैं जबकि चीन में ये आंकड़ा 20, ब्राज़ील में 16 और श्रीलंका में 13 है.

इस अंतरराष्ट्रीय मानव पूंजी सूचकांक में दुनिया के सभी देशों में भारत का नंबर 195 में 158वे नंबर आता है. भारत में कुपोषण की समस्या पहले जितनी विकराल नहीं है. लेकिन इस पर भी काबू किया जाना जरूरी है. विश्व बैंक के आंकड़ों के मुताबिक़, कुपोषण से जूझते बच्चे की लंबाई अगर वयस्क होने पर एक फ़ीसदी कम रहती है तो आर्थिक उत्पदाकता में इससे 1.4 फ़ीसदी ऩुकसान होता है, भारतीय जनता में बीमारियों की अधिकता और स्वास्थ्य सेवाओं की कमी ये दर्शाती है कि भारत अपने नागरिकों के स्वास्थ्य पर ध्यान नहीं देकर अपनी भविष्य की आर्थिक वृद्धि को कम महत्व दे रहा है.

मानवीय पूंजी का आकलन 20 से 64 साल के आयु वर्ग में जिए गए सालों से तय की जाती है. जीवन प्रत्याशा और बेहतर स्वास्थ्य सेवाएं किसी भी देश की श्रम करने की क्षमता को सीधे प्रभावित करते हैं.