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Lok Sabha Election 2019: क्यों वोटिंग के लिए अमेरिका भी नहीं करता EVM पर भरोसा

विकसित देश वोटिंग के लिए मशीन को भरोसेमंद नहीं मानते. यहां तक कि हैकिंग के डर से दुनिया के कई देशों ने ईवीएम पर बैन लगा दिया.

दुनियाभर में सौ से ज्यादा देश हैं, जहां लोकतांत्रिक ढंग से नेताओं के चुनाव का दावा होता है. हालांकि केवल 25 देश ही हैं, जो सरकार चुनने के लिए ईवीएम यानी इलेक्ट्रॉनिक वोटिंग मशीन का इस्तेमाल करते हैं या फिर कर चुके हैं. वोटों की गिनती के लिए भारत में प्रचलित ये शैली आखिर क्यों अमेरिका जैसे विकसित देशों में लोकप्रिय नहीं, जानिए, इसकी वजहें.

कैसे हुई शुरुआत
सालों तक भारत में बैलेट पेपर से वोटिंग होती रही. इसमें वोटों की गिनती में लंबा वक्त लगता था. इसे देखते हुए साल 1989 में इलेक्ट्रॉनिक्स कॉर्पोरेशन ऑफ इंडिया लिमिटेड की मदद से सरकार ने ईवीएम निर्माण की शुरुआत की. ईवीएम कभी भी विवादों से बरी नहीं रहा.

भारत में इसकी शुरुआत नवंबर 1998 में हुई. 16 विधानसभा चुनावों में वोटिंग के लिए ईवीएम का इस्तेमाल किया गया. इसके बाद से ये हर जगह चलने लगा और साल 2004 के आम चुनावों में पहली बार पूरे देश के मतदाताओं ने ईवीएम के जरिए अपने वोट डाले थे, तब से मतदान के लिए यही जरिया पूरे देश में लागू हो चुका है.

ईवीएम की वैधता या विश्वसनीयता पर सवाल
सवाल उठाने वालों में लगभग सारी प्रमुख पार्टियां शामिल हैं. साल 2009 में बीजेपी ने मशीन की वैधता पर सवाल उठाया. तब उसे चुनाव में करारी हार मिली थी. इसके बाद 2014 में कांग्रेस ने भी इसे कम भरोसेमंद करार दिया था. पार्टियों का मानना है कि चूंकि ईवीएम मशीन ही है, लिहाजा इससे छेड़छाड़ संभव है. इस पर बाकायदा एक किताब भी लिखी जा चुकी है- ‘डेमोक्रेसी एट रिस्क, कैन वी ट्रस्ट अवर इलेक्ट्रॉनिक वोटिंग मशीन.

हालांकि ईवीएम के साथ छेड़छाड़ की बातों के बीच और राजनैतिक दलों की मांग के की वजह से सुप्रीम कोर्ट के आदेश पर इलेक्शन कमीशन ने मतदाता सत्यापित पेपर ऑडिट ट्रेल (वीवीपीएटी) के साथ ईवीएम लागू किया. इसमें वोटर खुद ये तय कर पाता है कि उसका वोट उसी को गया है, जिसे उसने डाला है. दावा किया गया कि इससे ईवीएम से छेड़छाड़ की आशंका काफी हद तक दूर हो जाती है.