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अल्पसंख्यक की परिभाषा तय करने का मामला, सुप्रीम कोर्ट ने दिए ये निर्देश

अल्पसंख्यक की परिभाषा तय करने का मामला, सुप्रीम कोर्ट ने दिए ये निर्देश

सुप्रीम कोर्ट ने राष्ट्रीय अल्पसंख्यक आयोग को निर्देश दिया है कि वह अल्पसंख्यक की परिभाषा तय करने के अश्वनी कुमार उपाध्याय के ज्ञापन को तीन महीने मे निपटाए। उपाध्याय ने कोर्ट से परिभाषा तय करने की मांग कर कहा था कि उन्होंने आयोग को ज्ञापन दिया था, लेकिन उसने कुछ नहीं किया। सोमवार को कोर्ट ने अल्पसंख्यक की परिभाषा और अल्पसंख्यकों की पहचान के दिशा निर्देश तय करने की मांग पर सुनवाई कर यह निर्देश जारी किया। मुख्य न्यायाधीश रंजन गोगोई की अध्यक्षता वाली पीठ ने मामले पर सुनवाई की।भाजपा नेता अश्वनी कुमार उपाध्याय ने जनहित याचिका दाखिल कर सिर्फ वास्तव में अल्पसंख्यकों को अल्पसंख्यक संरक्षण दिये जाने की मांग की है। याचिका में मांग की गई कि राष्ट्रीय अल्पसंख्यक आयोग अधिनियम की धारा 2(सी) को रद किया जाए क्योंकि यह धारा मनमानी, अतार्किक और अनुच्छेद 14, 15 और 21 का उल्लंघन करती है। इस धारा में केंद्र सरकार को किसी भी समुदाय को अल्पसंख्यक घोषित करने के असीमित और मनमाने अधिकार दिए गए हैं। इसके अलावा मांग की गई  कि केंद्र सरकार की 23 अक्टूबर, 1993 की उस अधिसूचना को रद किया जाए, जिसमें पांच समुदायों मुसलमान, ईसाई, बौद्ध, सिख और पारसी को अल्पसंख्यक घोषित किया गया है।

तीसरी मांग में कहा कि केंद्र सरकार को निर्देश दिया जाए कि वह अल्पसंख्यक की परिभाषा तय करे और अल्पसंख्यकों की पहचान के लिए दिशानिर्देश बनाए। ताकि यह सुनिश्चित हो कि सिर्फ उन्हीं अल्पसंख्यकों को संविधान के अनुच्छेद 29-30 में अधिकार और संरक्षण मिले जो वास्तव में धार्मिक और भाषाई, सामाजिक, आर्थिक और राजनैतिक रूप से प्रभावशाली न हों और जो संख्या में बहुत कम हों।

याचिकाकर्ता ने इस मांग के साथ वैकल्पिक मांग भी रखी है जिसमें कहा है कि या तो कोर्ट स्वयं ही आदेश दे कि संविधान के अनुच्छेद 29-30 के तहत सिर्फ उन्हीं वर्गो को संरक्षण और अधिकार मिलेगा जो धार्मिक और भाषाई, आर्थिक, सामाजिक, राजनैतिक रूप से प्रभावशाली नहीं हैं और जिनकी संख्या राज्य की कुल जनसंख्या की एक फीसद से ज्यादा नहीं है।

याचिका में सुप्रीम कोर्ट के टीएमए पाई मामले में दिये गए संविधानपीठ के फैसले का हवाला देते हुए कहा गया है कि अल्पसंख्यक की पहचान राज्य स्तर पर की जाए न कि राष्ट्रीय स्तर पर। क्योंकि कई राज्यों में जो वर्ग बहुसंख्यक हैं उन्हें अल्पसंख्यक का लाभ मिल रहा है।

कहा गया है कि सरकार तकनीकी शिक्षा में 20,000 रुपये छात्रवृत्ति दी जाती है जम्मू कश्मीर में मुसलमान 68.30 फीसद हैं, लेकिन सरकार ने वहां 753 में से 717 छात्रवृत्ति मुस्लिम छात्रों को आवंटित की हैं एक भी हिन्दू को छात्रवृत्ति नहीं दी गई है।याचिका में कहा गया है कि मुसलमान लक्ष्यद्वीप में (96.20 फीसद), जम्मू कश्मीर में (68.30 फीसद) होते हुए बहुसंख्यक हैं जबकि असम में (34.20 फीसद), पश्चिम बंगाल में (27.5 फीसद), केरल में (26.60 फीसद), उत्तर प्रदेश में (19.30 फीसद) तथा बिहार में (18 फीसद) होते हुए अल्पसंख्यकों के दर्जे का लाभ उठा रहे हैं जबकि पहचान न होने के कारण जो वास्तव में अल्पसंख्यक हैं उन्हें लाभ नहीं मिल रहा है। इसलिए सरकार की अधिसूचना मनमानी है।यह भी कहा गया है कि ईसाई मिजोरम, मेघालय, नगालैंड में बहुसंख्यक हैं जबकि अरुणाचल प्रदेश, गोवा, केरल, मणिपुर, तमिलनाडु और पश्चिम बंगाल मे भी इनकी संख्या अच्छी है इसके बावजूद ये अल्पसंख्यक माने जाते हैं।इसी तरह पंजाब मे सिख बहुसंख्यक हैं जबकि दिल्ली, चंडीगढ़, और हरियाणा में भी अच्छी संख्या मे है लेकिन वे अल्पसंख्यक माने जाते हैं।