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अमरीका-रूस का समझौता टूटा तो भारत भी आएगा चपेट में

पुतिन और बुश

शीतयुद्ध के बीच तीसरे विश्वयुद्ध की आशंका को ख़त्म करने में अहम भूमिका निभाने वाली इस संधि के टूटने का ख़तरा पैदा हो गया है. अगर ये संधि टूटती है तो ये पूरी दुनिया की शांति के लिए बड़ा झटका होगा.

अमरीका के राष्ट्रपति रोनल्ड रीगन और सोवियत संघ के आठवें और आख़िरी नेता मिख़ैल गोर्बाचेव ने 8 दिसंबर, 1987 को इस ऐतिहासिक संधि पर हस्ताक्षर किए थे.

समझौते के बाद रोनल्ड रीगन ने अपने संबोधन में कहा था, “पहले हुई संधियों की तुलना में इस संधि में यह नहीं कहा गया है कि हम यथास्थिति बनाए रखेंगे. हथियारों की होड़ रोकने की बात भी नहीं की गई है. बल्कि इतिहास में पहली बार हथियारों को घटाने की बात की गई है. यानी अमरीका और सोवियत संघ की परमाणु मिसाइलों को हटाने की बात हुई है.”

उनकी ये पंक्तियां वाकई ऐतिहासिक थीं, क्योंकि इस संधि ने शीत युद्ध में उलझी दो महाशक्तियों के बीच न सिर्फ़ तनाव ख़त्म किया था बल्कि भरोसा भी कायम किया था.

दूसरे विश्वयुद्ध के बाद अमरीका और सोवियत संघ के बीच छिड़ा राजनीतिक और वैचारिक संघर्ष ख़त्म होने का नाम नहीं ले रहा था. 70 के दशक के मध्य में रूस ने अपने यूरोपीय हिस्से में ऐसी मध्यम दूरी की मिसाइलें तैनात कर दी थीं, जहां से पश्चिमी यूरोप को निशाना बनाया जा सकता था. इससे अमरीका और उसकी यूरोपीय सहयोगी चिंतित हो उठे थे.

इंटरमीडिएट रेंज की मिसाइलें इसलिए ख़तरनाक मानी जाती हैं क्योंकि ये चंद मिनटों में तबाही मचा सकती हैं. वहीं इंटरकॉन्टिनेंटल बैलिस्टिक मिसाइलों की रेंज भले लंबी हो, मगर उन्हें दूरी तय करने में भी ज़्यादा समय लगता है.

दिल्ली की जवाहरलाल नेहरू यूनिवर्सिटी के सेंटर फॉर रशियन ऐंड सेंट्रल एशियन स्टडीज़ में एसोसिएट प्रोफ़ेसर अमिताभ सिंह बताते हैं कि आईएनएफ़ संधि के बाद दोनों देशों ने बड़ी संख्य़ा में परमाणु मिसाइलों को नष्ट किया था.

अमिताभ कहते हैं, “ये वो दौर था जब शीतयुद्ध समाप्त होने को था. रीगन और गोर्बाचेव के बीच यह समझौता दोनों देशों और यूरोप में दशकों से चले आ रहे गतिरोध को खत्म करने की दिशा में एक अच्छी पहल था.

इस समझौते में तय किया गया कि 500 से 5500 किलोमीटर तक मारक क्षमता वाली मिसाइलों को नष्ट किया जाए. सोवियत संघ ने क़रीब 2000 और अमरीका ने 600 मिसाइलों को नष्ट किया था.

इस संधि का पूरा फ़ोकस यूरोप को लेकर था. सोवियत संघ की मिसाइलों के जवाब में अमरीका अपने नैटो सहयोगियों के यहां यूरोप में न्यूक्यिलर मिसाइल तैनात करता और फिर वे इन्हें एक-दूसरे के ख़िलाफ इस्तेमाल कर सकते थे. इस सैन्य रणनीति को म्यूचुअल अश्योर्ड डिस्ट्रक्शन (MAD) कहा जाता है.”

1980 में रोनल्ड रीगन अमरीका के राष्ट्रपति बने और 1985 में रूस में मिख़ैल गोर्बाचेव सत्ता में आए. ये वो दौर था जब हथियारों को होड़ के कारण मंद होती अर्थव्यवस्था के चलते सोवियत संघ की ताकत कम हो रही थी.

गोर्बाचेव अपेक्षाकृत युवा नेता थे और वह अपने सोवियत संघ की अर्थव्यवस्था को पटरी पर लाना चाहते थे. इसके लिए हथियारों की होड़ पर रोक लगाना ज़रूरी था. ऐसे में 80 के दशक के मध्य में रीगन और गोर्बाचेव ने बातचीत की पहल की. 1987 आते-आते दोनों ने इंटरमीडिएट-रेंज न्यूक्लियर फोर्सेज़ ट्रीटी पर दस्तख़त किए.

दोनों देशों ने अपने यहां 500 से लेकर 5,500 किलोमीटर की रेंज वाली मिसाइलें नष्ट की और एक-दूसरे की टीमों को अपने यहां जांच करने के लिए भी आने दिया.

ये पहला मौक़ा था जब दुनिया को यक़ीन हुआ कि शीत युद्ध ख़त्म हो सकता है. जवाहरलाल नेहरू यूनिवर्सिटी के सेंटर फॉर कनैडियन, यूएस ऐंड लैटिन अमरीकी स्टीडीज़ के प्रोफेसर चिंतामणि महापात्रा बताते हैं-

“इस समझौते के कारण यूरोप से 5000 किलोमीटर तक परमाणु हथियार ले जाने वाली मिसाइलें हट गईं. जब ये समझौता हुआ तो कोल्ड वॉर ख़त्म करने की दिशा में पहला क़दम था. बाद में सोवियत संघ का विघटन हो गया और शीत युद्ध का अंत हो गया. लेकिन आईएनएफ़ ट्रीटी को सांकेतिक रूप से परमाणु हथियारों को ख़त्म करने की दिशा में एक बड़ी उपलब्धि माना जाता है. इसे लेकर पूरी दुनिया ख़ुश थी. भारत के तत्कालीन प्रधानमंत्री राजीव गांधी ने भी इस समझौते की प्रशंसा की थी.”

जो हथियार महज कुछ मिनटों में तबाही मचा सकते थे, आईएनएफ़ संधि ने उन्हें म्यूज़ियमों में पहुंचा दिया. सोवियत संघ का विघटन भी हो गया, मगर अमरीका और रूस इस समझौते का सम्मान करते रहे.

लेकिन बाद में धीरे-धीरे दोनों देशों में विश्वास कम होता गया. 2002 में अमरीका एंटी बैलिस्टिक मिसाइल ट्रीटी से पीछे हट गया, जिसपर 1972 में दस्तख़त हुए थे.

प्रोफ़ेसर चिंतामणि महापात्रा बताते हैं कि जब भी अमरीका में रिपब्लिकन राष्ट्रपति बनते हैं, हथियारों और सुरक्षा को लेकर उनका रवैया अलग रहता है और इसी कारण डोनल्ड ट्रंप अब आईएनएफ़ से पीछे हटने की दिशा में बढ़ रहे हैं.

प्रोफ़ेसर महापात्रा बताते हैं, “ट्रंप रिपब्लिकन पार्टी के नेता हैं. रिपब्लिकन राष्ट्रपति आर्म्स कंट्रोल में यक़ीन नहीं रखते. उनका मानना है कि अमरीका जो-जो नए हथियार बना सकता है, वे उसे बनाने चाहिए. वे मानते हैं कि सिर्फ़ समझौतों पर दस्तख़त करके अमरीका अपनी रक्षा नहीं कर सकता. 2002 में बुश 1972 में साइन हुई एंटी बैलिस्टिक मिसाइट ट्रीटी से हट गए थे. उस समय रूस ने काफ़ी शोर किया था मगर कुछ हुआ नहीं था. आईमएफ़ ट्रीटी मिसाइलों को रोकने का बेहतरीन नमूना थी, अब उसपर भी संकट आ गया है.”