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महागठबंधन में सीटों की पेंच: घटक दलों को चाहिए हैसियत से ज्यादा, असमंजस में बड़े दल

महागठबंधन में सीटों की पेंच: घटक दलों को चाहिए हैसियत से ज्यादा, असमंजस में बड़े दल

अब खरमास भी खत्म हो गया, लेकिन महागठबंधन के घटक दलों में सीट बंटवारे पर बात अभी फाइनल नहीं हो सकी है। अब कहा जा रहा है कि जनवरी के आखिरी या फरवरी के पहले हफ्ते में सीटें बांट ली जाएंगी। घटक दलों की अपनी दलील है।

कांग्रेस को पटना में तीन फरवरी की रैली का इंतजार है, किंतु हकीकत यह भी है कि वह जदयू-भाजपा में सीट बंटवारे के फार्मूले की तर्ज पर राजद के साथ बराबर की हिस्सेदारी चाहती है।

राजग में सीटों की हिस्सेदारी तय होने के बाद महागठबंधन के घटक दलों ने सात जनवरी को ही अनौपचारिक बैठक बुलाकर अपनी-अपनी दावेदारी रखी थी।

बैठक के बाद नेता प्रतिपक्ष तेजस्वी यादव एवं रालोसपा प्रमुख उपेंद्र कुशवाहा ने मीडिया को बताया भी था कि सीटों पर प्रारंभिक सहमति बन चुकी है। खरमास के बाद खुलासा होगा। महागठबंधन के छोटे घटक दल अपने बड़े सहयोगी दलों पर लगातार दबाव बनाए हुए हैं।

राजद के राष्ट्रीय उपाध्यक्ष शिवानंद तिवारी महागठबंधन में सीटों को लेकर किसी तरह के पेंच से इनकार करते हैं और कहते हैं कि अभी तो खरमास खत्म ही हुआ है। एक-दो बैठक तो कर लेने दीजिए। सबकुछ साफ और तय हो जाएगा।हालांकि हिन्दुस्तानी आवाम मोर्चा (हम) के प्रमुख जीतनराम मांझी के मुताबिक महागठबंधन को भाजपा-जदयू के पहलवानों का अखाड़े में उतरने का इंतजार है। मांझी यह भी जोड़ते हैं कि हमारे खेमे में कोई झंझट नहीं है। तेजस्वी यादव के कोलकाता की रैली से लौटने के बाद अगले हफ्ते तक सभी घटक दल फिर से बैठेंगे। सीटों का स्वरूप तय हो जाएगा।

सीट बंटवारे में विलंब की वजह से कांग्रेस के तीन मकसद सध रहे हैं। उसकी पहली प्राथमिकता में रैली है, जो तीन फरवरी को पटना के गांधी मैदान में होने जा रही है। इसमें राहुल गांधी को भी आना है। साथी दलों को भी बुलाया गया है।

कांग्रेस के नेता चाहते हैं कि रैली में भीड़ जुटाकर अधिक सीटों की दावेदारी के लिए राजद पर दबाव बनाया जाए। कांग्रेस को एक डर यह भी है कि रैली से पहले सीटों से पर्दा हट जाने के बाद टिकट से वंचित नेता सुस्त पड़ जाएंगे। वह दूसरे दलों में भी ताकझांक कर सकते हैं।