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ये है सांता क्लॉज की पूरी कहानी, ऐसे मिली थी पहचान

Christmas: ये है सांता क्लॉज की पूरी कहानी, ऐसे मिली थी पहचान

क्रिसमस का नाम सुनते ही बच्चों के मन में सफेद और लंबी दाढ़ी वाले लाल रंग के कपड़े में सिर पर टोपी पहने और पीठ पर खिलौनों का झोला लादे बूढ़े ‘सांता क्लॉज’ की तस्वीर उभरने लगती है. क्रिसमस के दिन बच्चों को खासतौर पर सांता क्लॉज का इंतजार रहता है, क्योंकि इस दिन वह बच्चों के लिए ढेर सारे उपहार और तरह-तरह के खिलौने लेकर आते हैं.

ईसाई समुदाय में कहा जाता है कि सांता क्लॉज बच्चों के लिए सीधे स्वर्ग से धरती पर उपहार लेकर आते हैं और देने के बाद वापस चले जाते हैं. उपहार में टॉफियां, चॉकलेट, फल, खिलौने और तमाम चीजें होती हैं. बच्चे प्यार से सांता क्लॉज को ‘क्रिसमस फादर’ भी कहते हैं.

क्रिसमस के मौके पर तमाम लोग सांता क्लॉज की वेशभूषा में बच्चों को उपहार देते हैं. सांता के प्रति न केवल ईसाई समुदाय बल्कि, दुनियाभर में अन्य समुदायों के बच्चों का आकर्षण भी पिछले कुछ समय में काफी बढ़ा है.

कहा जाता है कि सांता क्लॉज चौथी शताब्दी में मायरा के निकट एक शहर (जो अब तुर्की के नाम से जाना जाता है) में जन्मे संत निकोलस का ही रूप हैं. संत निकोलस के पिता एक बहुत बड़े व्यापारी थे, जिन्होंने निकोलस को अच्छे संस्कार देते हुए दूसरों के प्रति सदा दयाभाव रखने और जरूरतमंदों की सहायता करने को प्रेरित किया. निकोलस पर इन सब बातों का इतना असर हुआ कि वह हर समय जरूरतमंदों की सहायता करने को तत्पर रहते थे. लेकिन बच्चों से उन्हें खास लगाव हो गया था.

माना जाता है कि अपनी ढेर सारी दौलत में से बच्चों के लिए वह ढेर सारे खिलौने खरीदते और खिड़कियों से उनके घरों में डाल देते थे.

संत निकोलस की याद में कुछ जगहों पर हर वर्ष 6 दिसंबर को ‘संत निकोलस दिवस’ भी मनाया जाता है. इसके पीछे यही धारणा है कि वह इसी दिन गरीब लड़कियों की शादी के लिए धन व तोहफे दिया करते थे, लेकिन वह बच्चों को 25 दिसंबर को ही तोहफे बांटते थे.

ऐसी भी मान्यता है कि संत निकोलस की लोकप्रियता से जलने वाले कुछ लोगों ने 6 दिसंबर के दिन उनकी हत्या कर दी थी, इसलिए 6 दिसंबर को ‘संत निकोलस दिवस’ भी मनाया जाने लगा.

सांता क्लॉज के बारे में कई कथाएं प्रचलित हैं. एक कथा के मुताबिक, कहा जाता है कि एक बार निकोलस को मायरा के एक ऐसे व्यक्ति के बारे में जानकारी मिली, जो बहुत धनवान था, लेकिन कुछ समय पहले व्यापार में भारी घाटा हो जाने से वह कंगाल हो चुका था. उस व्यक्ति की चार बेटियां थी, लेकिन उनके विवाह के लिए उसके पास कुछ नहीं बचा था. यहां तक कि उसके परिवार के लिए तो खाने के भी लाले पड़ गए थे.

जब उससे अपने परिवार की इतनी बुरी हालत देखी नहीं गई और लड़कियां विवाह योग्य हो गईं, तो उसने फैसला किया कि वह इनमें से एक लड़की को बेच देगा और उससे मिले पैसे से अपने परिवार का पालन-पोषण करेगा. साथ ही बाकी बेटियों का विवाह करेगा.

इसके बाद अगले दिन अपनी एक बेटी को बेचने का विचार करके वह रात को सो गया. लेकिन उसी रात संत निकोलस उसके घर पहुंचे और चुपके से खिड़की में से सोने के सिक्कों से भरा एक बैग उसके घर में डालकर चले गए.सुबह जब उस व्यक्ति की आंख खुली और उसने सोने के सिक्कों से भरा बैग खिड़की के पास पड़ा देखा, तो वह बहुत आश्चर्यचकित हुआ कि यह बैग यहां कहां से आया? उसने आस-पास चारों तरफ देखा लेकिन उसे कहीं कोई दिखाई नहीं दिया, तो उसने ईश्वर का धन्यवाद करते हुए बैग अपने पास रख लिया और एक-एक कर धूमधाम से अपनी चारों बेटियों की शादी की. बाद में उसे पता चला कि यह बैग संत निकोलस ही उसकी बेटियों की शादी के लिए उसके घर छोड़ गए थे.

हर व्यक्ति के प्रति निकोलस के हृदय में दया भाव और जरूरतमंदों की सहायता करने की उनकी भावना को देखते हुए मायरा शहर के समस्त पादरियों, पड़ोसी शहरों के पादरियों और शहर के गणमान्य व्यक्तियों के कहने पर मायरा के बिशप की मृत्यु के उपरांत निकोलस को मायरा का नया बिशप नियुक्त किया गया, क्योंकि सभी का यही मानना था कि ईश्वर ने निकोलस को उन सभी का मार्गदर्शन करने के लिए ही भेजा है.

बिशप के रूप में निकोलस की जिम्मेदारियां और बढ़ गई. एक बिशप के रूप में अब उन्हें शहर के हर व्यक्ति की जरूरतों का ध्यान रखना होता था. जहां भी कोई व्यक्ति परेशानी में होता, निकोलस उसी क्षण वहां पहुंच जाते थे और उसकी जरूरतों को पूरा कर उसके धन्यवाद का इंतजार किए बिना ही दूसरे जरूरतमंद की जरूरतें पूरी करने आगे निकल पड़ते थे.

वह इस बात का खासतौर पर ख्याल रखते कि शहर में हर व्यक्ति को भरपेट भोजन मिले, रहने के लिए अच्छी जगह और सभी की बेटियों की शादी धूमधाम से सम्पन्न हो.यही कारण था कि निकोलस एक संत के रूप में बहुत प्रसिद्ध हो गए और न केवल आम आदमी बल्कि चोर-लुटेरे और डाकू भी उन्हें चाहने लगे. उनकी प्रसिद्धि चारों ओर फैलने लगी और जब उनकी प्रसिद्धि उत्तरी यूरोप में भी फैली तो लोगों ने आदरपूर्वक निकोलस को ‘क्लॉज’ कहना शुरू कर दिया.

चूंकि कैथोलिक चर्च ने उन्हें ‘संत’ का ओहदा दिया था, इसलिए उन्हें ‘सेंट क्लॉज’ कहा जाने लगा. यही नाम बाद में ‘सेंटा क्लॉज’ बन गया, जो वर्तमान में ‘सांता क्लॉज’ के नाम से प्रसिद्ध है.समुद्र में खतरों से खेलने वाले नाविकों और बच्चों से तो निकोलस को विशेष लगाव था. यही वजह है कि संत निकोलस (सांता क्लॉज) को ‘बच्चों और नाविकों का संत’ भी कहा जाता है. निकोलस के देहांत के बाद उनकी याद में एशिया का सबसे प्राचीन चर्च बनवाया गया, जो आज भी ‘सेंट निकोलस चर्च’ के नाम से विख्यात है, जो ईसाई तथा मुसलमानों दोनों का सामूहिक धार्मिक स्थल है.