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70 साल में 8 बार जेपीसी का गठन हुआ, पांच सरकारें अगला आम चुनाव हार गईं

Congress demands JPC, BJP does not want

संसद का शीतकालीन सत्र शुरू हुए चार दिन हो गए हैं, लेकिन एक भी दिन दोनों सदनों में सुचारू रूप से कामकाज नहीं हो सका है। वजह, राफेल डील है। कांग्रेस समेत पूरा विपक्ष केंद्र सरकार से राफेल डील को लेकर ज्वाॅइंट पार्लियामेंट कमेटी (जेपीसी) के गठन की मांग कर रहा है। पर, सरकार इस पर राजी नहीं है।हालांकि, केंद्र सरकार शुरू से कह रही है कि वह इस मुद्दे पर दोनों सदनों में चर्चा के लिए तैयार है। इस बीच शुक्रवार को सुप्रीम कोर्ट ने राफेल डील पर अपना फैसला सुनाते हुए सरकार को सभी आरोपों से बरी कर दिया। इसके बाद सदन में पूरी सरकार काफी उत्साह में नजर आई। हालांकि, फैसले के बाद देर शाम कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी ने प्रेस कॉन्फ्रेंस कर दोबारा जेपीसी के गठन की मांग कर दी। ऐसे में विपक्षी दल सवाल उठा रहे हैं कि आखिर मोदी सरकार जेपीसी का गठन करना क्यों नहीं करना चाहती है?

अब तक देश के 70 साल के संसदीय इतिहास में 8 बार किसी मामले को लेकर सरकार ने जेपीसी का गठन किया है। इसमें से पांच बार ऐसा हुआ, जब सत्तारूढ़ दल अगला आम चुनाव हार गई। सबसे पहले 1987 में राजीव गांधी सरकार ने बोफोर्स तोप खरीद मामले में जेपीसी का गठन किया था। इसके बाद 1989 में कांग्रेस आम चुनाव हार गई। इसके बाद 1992 में पीवी नरसिंहराव सरकार ने सुरक्षा एवं बैंकिंग लेन-देन में अनियमितता को लेकर जेपीसी का गठन किया। तब 1996 में हुए आम चुनाव में कांग्रेस हार गई। एक कार्यकाल में सबसे ज्यादा दो बार जेपीसी का गठन पिछली मनमोहन सिंह और मौजूदा मोदी सरकार में हुआ। 2003 में वाजपेयी सरकार ने भी जेपीसी का गठन किया था।ज्व‍ाइंट पार्लियामेंटरी कमेटी(जेपीसी) में दोनों सदनों के सदस्य होते हैं। जेपीसी का गठन सरकार बेहद गंभीर मामलों में ही करती है।

समिति ऐसे किसी भी व्यक्ति, संस्था से पूछताछ कर सकती है, जिसको ले‍कर उसका गठन हुआ है। यदि वह जेपीसी के समक्ष पेश नहीं होता है तो यह संसद की अवमानना मानी जाएगी। जेपीसी संबंधित मामले में लिखित, मौखिक जवाब या फिर दोनों मांग सकती है। लोकसभा के पूर्व महासचिव व संविधान विशेषज्ञ पीडीटी आचारी बताते हैं कि इसमें अधिकतम 30-31 सदस्यों की नियुक्ति होती है। समिति का चेयरमैन बहुमत वाली पार्टी के सदस्य को बनाया जाता है। समिति में शामिल सदस्यों में बहुमत वाले राजनीतिक दल के सदस्यों की संख्या भी अधिक होती है। समिति के पास मामले की जांच के लिए अधिकतम समय सीमा 3 महीने होती है।

इसके बाद उसे अपनी रिपोर्ट संसद के समक्ष पेश करनी होती है।जेपीसी में बहुमत से फैसला होता है। समिति में सबसे ज्यादा लोग सत्तारूढ़ पार्टी के होते हैं, ऐसे में अक्सर निर्णय सरकार के पक्ष में ही आता है। जैसे, 2जी मामले में हुआ। रिपोर्ट में सरकार को क्लीनचिट मिली, पर कोर्ट में चोरी पकड़ी गई। असर, 2014 चुनाव में हुआ।जेपीसी के पास असीमित अधिकार होते हैं। चूंकि यह मामला सीधे प्रधानमंत्री से जुड़ा हुआ है। ऐसे में यदि जेपीसी बनाई गई तो मोदी से भी सवाल हो सकता है। इसीलिए सरकार जेपीसी के गठन से बच रही है। तर्क, संवेदनशील जानकारियों का दे रही है।