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राज्यपाल नाईक ने चार हत्याओं के दोषी की माफ की थी सज़ा

राज्यपाल नाईक ने चार हत्याओं के दोषी की माफ की थी सज़ा, अब SC ने पलटा फैसला

सुप्रीम कोर्ट ने चार सियासी हत्या के एक दोषी की सजा माफ करने से जुड़े यूपी के राज्यपाल राम नाईक के फैसले को पलट दिया है. सुप्रीम कोर्ट ने अपने आदेश में कहा कि राज्यपाल के इस फैसले ने कोर्ट की चेतना को हिलाकर रख दिया है, जिसकी वजह से कोर्ट को मजबूरन इस मामले में हस्तक्षेप करना पड़ रहा है.

जस्टिस एनवी रमन और जस्टिस एमएम शांतनागोडर की पीठ ने कहा कि दोषी को उम्र कैद की सज़ा हुई थी, तो आखिर क्या कारण है कि सिर्फ सात साल की सज़ा काटने के बाद ही उसे छोड़ने का फैसला लिया गया.सुप्रीम कोर्ट ने मार्कंडेय शाही की याचिका को खारिज करते हुए इस बात पर हैरानी जताई और कहा कि राज्यपाल ने कैसे अपने संवैधानिक अधिकारों का प्रयोग किसी ऐसे अपराधी को रिहा करने के लिए किया जो चार हत्याओं का दोषी है. कोर्ट ने कहा, ‘सिर्फ यही नहीं ये फैसला राज्यपाल द्वारा तब लिया गया है जब उसको मिली सज़ा के खिलाफ मामला हाईकोर्ट में चल रहा है.’


वहीं शाही के वकील अमरेंद्र शरन ने दलील दी कि राज्यपाल अपने द्वारा लिए गए संवैधानिक फैसलों का कारण बताने को बाध्य नहीं हैं, लेकिन इस दलील से कोर्ट पर कोई प्रभाव नहीं पड़ा. कोर्ट ने कहा कि दोषी ज़मानत पर बाहर था उस वक्त उसने चार अलग-अलग आपराधिक मामलों को अंजाम दिया. इस पर शाही के वकील ने दोषी मार्कंडेय शाही के खराब स्वास्थ्य को जमानत की वजह बताई.

बता दें कि मार्कंडेय शाही ने ये हत्याएं 1987 में की थीं. उस वक्त पूरा पूर्वांचल में हरिशंकर तिवारी और वीरेंद्र प्रताप शाही के नियंत्रण में था. इन दोनों में राजनीतिक विरोध था. जहां ये अपराध किए गए थे वो जगह इस वक्त महाराजगंज ज़िले में पड़ती है.

उत्तर प्रदेश के राज्यपाल राम नाईक ने सितंबर 2017 में शाही की सज़ा माफ कर दी थी, जबकि एसएसपी और जिलाधिकारी ने शाही को समय पूर्व मुक्त किए जाने की सिफारिश नहीं की थी. ऐसे में राम नाईक ने संविधान में अनुच्छेद 161 के तहत दिए गए अपने अधिकारों का प्रयोग करते हुए शाही को मुक्त करने का फैसला लिया था.

राज्यपाल के फैसले के खिलाफ महंत शंकरसन रामानुज दास ने इलाहाबाद हाईकोर्ट में याचिका दायर कर योगी आदित्यनाथ की सरकार पर शाही का पक्ष लेने का आरोप लगाया था. हाईकोर्ट में उत्तर प्रदेश सरकार ने राज्यपाल के फैसले का समर्थन किया और कहा कि उनके द्वारा प्रयोग किए गए अधिकार संवैधानिक हैं. हालांकि हाईकोर्ट ने इस दलील को खारिज कर दिया और राज्यपाल के फैसले के खिलाफ शाही को पुलिस हिरासत में लेने का आदेश दिया था.