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विधानसभा चुनाव: वुमनिया फैक्टर ने खींचा राजनीतिक दलों का ध्यान

पांच राज्यों के विधानसभा चुनाव में जहां नए वोटरों के मिजाज पर सभी दलों की नजरें टिकी हैं, वहीं महिलाएं भी अपनी ताकत दिखाने को तैयार हैं। पिछले कुछ चुनावों से जिस तरह वोटिंग में इनकी भागीदरी बढ़ी है, अचानक कई सीटों पर महिलाएं निर्णायक फैक्टर बन गई हैं। 20 नवंबर को छत्तीसगढ़ की 90 सीटों पर हुई वोटिंग और 28 नवंबर को मध्य प्रदेश की 230 सीटों पर हुई वोटिंग में महिलाओं की भागीदरी ने सभी राजनीतिक दलों को कंफ्यूज कर दिया है। 2013 के मुकाबले इस बार जो ज्यादा वोटिंग इन दोनों राज्यों में हुई है, उनमें महिलाओं की भागीदारी अधिक है। दरअसल, हाल के दिनों में कुछ राज्यों के विधानसभा चुनाव में महिलाएं, खासकर ग्रामीण महिलाओं ने नतीजों को सीधे तौर पर प्रभावित किया है। इनकी बढ़ती ताकत को देखते हुए अब राजनीतिक दलों के अजेंडे में इन्हें लुभाना भी शामिल हो गया है। हालिया चुनावों में महिलाएं निर्णायक फैक्टर साबित हुई हैं, जिसे देखते हुए सरकार और राजनीतिक दल महिला केंद्रित नीतियां बनाने को मजबूर हो गए हैं। मध्य प्रदेश में शिवराज सिंह चौहान की लोकप्रियता के पीछे गर्भवती महिला से लेकर शादी की उम्र की लड़कियों के लिए, हर मोड़ पर बनी अलग-अलग योजनाओं का बड़ा योगदान है। इससे वह राज्य में मामा के नाम से मशहूर हुए।

पीएम नरेंद्र मोदी ने भी इस ट्रेंड को देखा और इसे बीजेपी के पक्ष में करने की पूरी कोशिश की। फ्री एलपीजी कनेक्शन देने के लिए उज्ज्वला योजना से उन्हें चुनावी लाभ भी मिला है। वहीं, बिहार में नीतीश कुमार ने साइकल वितरण से लेकर पंचायत चुनाव में 33 फीसदी आरक्षण का दांव खेलकर महिलाओं का वोट पाने में सफलता हासिल की। इस बार मध्य प्रदेश में बीजेपी ने महिलाओं के लिए अलग से घोषणापत्र जारी किया, तो कांग्रेस ने भी महिलाओं के लिए कई वादे किए। चुनाव आयोग ने भी हाल के वर्षों में महिलाओं को बूथ तक खींचने की कई कोशिशें कीं, जिनका सकारात्मक प्रभाव पड़ा है। लोकसभा से लेकर विधानसभा चुनाव तक, सभी जगह इनकी वोटिंग में 10 से 15 फीसदी तक इजाफा हुआ। चुनाव आयोग ने इन कारणों पर विशेष ध्यान दिया और स्थानीय महिलाओं में जागरूकता फैलाने के लिए कई कदम उठाए। सभी वोटरों को घरों तक फोटो पहचान पत्र चुनाव पूर्व उपलब्ध कराने के प्रयास किए गए। वोट के दौरान मुकम्मल सुरक्षा रहे, इसकी पूरी व्यवस्था की गई।