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उत्‍तराखंड:! कागजों में दम तोड़ रही है संजीवनी बूटीखोजने की कोशिशें

देहरादून: संजीवनी बूटी, जिसका जिक्र रामायण में मिलता है. इसी संजीवनी बूटी के कारण भगवान लक्ष्‍मण को नया जीवन मिला था. क्या वाकई वो आज भी मौजूद है? चमोली के द्रोणा पर्वत पर संजीवनी बूटी होने के दावे में कितनी सच्चाई है और क्या संजीवनी बूटी से गंभीर रोगों को इलाज संभव है. ये वो सवाल हैं, जिनका जवाब आज तक नहीं मिल पाया है. हालांकि, संजीवनी बूटी की खोज के लिए दो बार कमेटी का गठन हो चुका है. पहली बार साल 2007-08 में बीजेपी सरकार ने कमेटी का गठन किया, लेकिन कोई नतीजा नहीं निकला. साल 2016 में कांग्रेस सरकार ने दोबारा कमेटी बनाई, लेकिन कमेटी के सदस्य आज तक चमोली नहीं पहुंच सके.

आयुष निदेशक की अध्यक्षता में कमेटी का गठन किया गया था, लेकिन कमेटी के सदस्य चमोली क्यों नहीं पहुंचे. उसके पीछे विभाग का अपना तर्क है. आयुष निदेशक डॉ. अरुण कहते हैं कि कमेटी की तरफ से 20 लाख रुपए की मांग की गई थी, लेकिन 3 साल से ज्यादा का वक्त गुजर चुका है. सरकार ने धनराशि जारी ही नहीं की है. ऐसे में संजीवनी बूटी की तलाश कैसे मुमकिन हो सकती है.

दरअसल, संजीवनी बूटी की खोज पर छिड़ी बहस रामायण के उस काल खंड का हिस्सा है, जिसमें रावण के साथ युद्ध में शक्ति बाण लगने से लक्ष्मण मूर्छित हो गए थे और उन्हें जीवित करने के लिए हनुमान जी द्रोणागिरी पर्वत से संजीवनी बूटी लेकर गए थे. क्योंकि हनुमान जी को ये समझ नहीं आ रहा था कि संजीवनी बूटी कौन सी है लिहाजा, वो पर्वत का एक हिस्सा लेकर लंका चले गए थे. कहा जाता है कि चंद्र और ऋषभ शिखरों के बीच पर्वत के गायब होने के निशान आज भी मौजूद हैं. अलबत्ता संजीवनी बूटी भी मौजूद होगी.

समद्र तल से करीब 14,000 फीट की ऊंचाई की स्थित द्रोणागिरि गांव में आज भी हनुमान जी की पूजा नहीं होती है. यहां तक कि गांव में लाल झंडा लगाना तक मना है. ऐसी मान्यता है कि ग्रामीण उस पर्वत की पूजा करते थे, जिसे हनुमान जी उठाकर ले गए. इससे इस बात को बल मिलता है कि हो न हो. रामायण काल में जिस जगह और पर्वत का जिक्र किया गया है. वो यही जगह है, लेकिन संजीवनी बूटी इन पहाड़ों में आज भी मौजूद है या नहीं इसका कोई प्रमाण अब तक नहीं मिला है. क्योंकि संजीवनी बूटी खोजने की सारी कवायद, सारी कोशिशें फाइलों में दम तोड़ रही हैं.