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बदलाव की हो रही बात लेकिन कांग्रेस की राह आसान नहीं

दो दिन बाद मध्य प्रदेश के वोटर नई सरकार का फैसला ईवीएम में बंद कर देंगे। प्रदेश में कांग्रेस को इस बार काफी उम्मीदें हैं वहीं, बीजेपी भी वापसी का दावा कर रही है। नवभारत टाइम्स ने मध्य प्रदेश के शहरी इलाकों से लेकर ग्रामीण इलाकों में जाकर जाना, क्या है इस बार चुनावी हवा? जहां भोपाल और इंदौर जैसी शहरी सीटों में युवा खुलकर बीजेपी के पक्ष में बोलते दिखे वहीं मंदसौर, नीमच, धार, बेतुल, होशंगाबाद, छिंदवाड़ा जैसे रूरल एरिया में किसान अपनी दिक्कतों का जिक्र करते मिले। झाबुआ में आदिवासी किसी राजनीतिक दल पर भरोसा न करने की बात कर रहे थे वहीं, छिंदवाड़ा से बुधनी तक लोग नेता के नाम पर वोट करने का मन बनाते दिखे। आइए समझते हैं वह संकेत जो तय करेंगे कि मध्य प्रदेश में अगली सरकार किसकी बनेगी। मध्य प्रदेश में कहीं भी चले जाएंगे लोग खुलकर बदलाव की बात करते दिख रहे हैं। कुछ अपनी दिक्कतें गिनाते हुए ‘इस बार बदलाव होना चाहिए’ कह रहे थे तो कुछ लोग अब किसी दूसरे को आजमाने की ख्वाहिश में बदलाव की बात करते मिले। 15 साल से राज्य की सत्ता से बाहर कांग्रेस के लिए यह अच्छा संकेत है कि लोग बदलाव की बात कर रहे हैं। यह बदलाव हालांकि लोकल स्तर पर अधिक है।

हालांकि बदलाव की बयार के बीच लोगों ने कांग्रेस को पूरी तरह विकल्प के रूप में मानने से इनकार किया। लोगों के जेहन में अब भी कांग्रेस शासन से जुड़ी अच्छी यादें नहीं हैं। इससे लोगों में कही न कहीं विकल्पहीनता की स्थिति भी दिखने लगी है। यह कांग्रेस की कमजोरी भी दिखा रहा है कि लोग कांग्रेस को जिताने की बात नहीं कर रहे। बीजपी को जिताने या बीजेपी को हटाने की बात पर ही चुनाव फोकस है। लोग भले ही बदलाव की बात कर रहे हैं लेकिन शिवराज सिंह चौहान से नाराजगी नजर नहीं आई। यह बीजेपी की उम्मीद बढ़ाती है। लोग जहां अपनी दिक्कतें बता रहे हैं वहीं, शिवराज सरकार की वेलफेयर स्कीमों का भी जिक्र कर रहे हैं। शिवराज की ‘मामा’ वाली छवि 15 साल बाद भी पूरी तरह टिकी है।

यहां न तो ‘मंदिर वहीं बनाएंगे’ नारे का असर दिख रहा है और न ही राफेल घोटाले के आरोपों का। लोग स्थानीय मुद्दों की बात कर रहे हैं। किसानों के बीच जहां फसल की लागत मूल्य भी न निकलने का मुद्दा है वहीं, भावांतर स्कीम का जिक्र भी लोग कर रहे हैं। युवाओं में रोजगार से लेकर अच्छी सड़कों की बात हो रही है। किसी भी पार्टी या नेता की हवा नहीं है इस चुनाव में इसलिए हर एक सीट मायने रखेगी। बीजेपी और कांग्रेस नेता भी इसे समझ रहे हैं। किसानों की नाराजगी को कांग्रेस भुनाने की कोशिश कर रही है और इसलिए घोषणापत्र में किसानों का 2 लाख रुपये कर्ज माफ करने का वादा भी किया है। इसका असर भी किसानों में दिख रहा है। हालांकि कई किसान पहले कांग्रेस राज में हुई बिजली की दिक्कत का भी जिक्र करते हैं इसलिए किसानों की नाराजगी और पिछले साल हुआ किसान आंदोलन कांग्रेस को कुछ फायदा तो दे सकता है लेकिन इतना भी नहीं कि उसकी जीत का रास्ता एकदम साफ हो जाए। बीजेपी के लिए उम्मीद अभी बाकी है। किसानों के बीच जहां नोटबंदी भी मसला है वहीं, व्यापारी जीएसटी का जिक्र कर रहे हैं। किसान अब भी नोटबंदी के दौरान हुई दिक्कतों की दास्तां सुना रहे हैं। इलाके में घूमने पर लगता है कि कोई एक प्रदेश का नहीं बल्कि 230 अलग-अलग सीटों का चुनाव हो रहा है। एक विधानसभा क्षेत्र से बाहर निकलने पर दूसरे सीट पर पूरी तरह अलग तस्वीर दिखने लगती है। हर जगह अलग-अलग समीकरण हैं। दलों की रणनीति भी इसी तरह बनी है।

कांग्रेस और बीजेपी दोनों दलों को अंदाजा है कि कितना कड़ा मुकाबला है। यही कारण है कि दोनों दलों के नेता सबसे अधिक फोकस घ्रर-घर जनसंपर्क और बूथ मैनेजमेंट पर कर रहे हैं। दोनों दलों के नेताओं ने माना कि यह चुनाव इससे तय नहीं होगा कि किसने कितनी रैलियां की बल्कि इससे होगा कि किसने कितने घ्ररों में जाकर लोगों तक अपनी बात पहुंचाई और बूथ तक अपने वोटरों को खींचा। कांग्रेस ने इस चुनाव में भी अपने सीएम उम्मीदवार की घोषणा नहीं की है लेकिन पूरा प्रचार कमलनाथ और ज्योतिरादित्य सिंधिया के इर्द-गिर्द घूम रहा है। ऐसे में छिंदवाड़ा और आसपास के इलाके में कमलनाथ के सीएम उम्मीदवार के पोस्टर दिख जाएंगे तो ज्योतिरादित्य के पोस्टर उनके इलाके में। इससे कहीं उनका लाभ तो कहीं नुकसान भी हो रहा है।