देश राजनीती होम

हर चुनाव में ताजा हो जाते हैं महाराज हनवंत और जुबैदा के किस्से

Rajsathan Election 2018: हर चुनाव में ताजा हो जाते हैं महाराज हनवंत और जुबैदा के किस्से

राजस्थान विधानसभा चुनाव में इस बार मारवाड़ राज परिवार की कोई सक्रियता तो नहीं है लेकिन, चुनावी चर्चाओं में महाराजा हनवंत को याद करना यहां के लोग भूलते नहीं। लोकसभा के पहले ही आम चुनाव में महाराज ने तत्कालीन मुख्यमंत्री जयनारायण व्यास को करारी शिकस्त दी थी। वह अपनी जीत का नतीजा भी नहीं सुन पाये थे। मतगणना में भारी बढ़त की खुशी में अपनी प्रेयसी जुबैदा के साथ हवाई जहाज से सैर करने निकले और दुर्घटना में मारे गये। यह दुर्घटना आज तक रहस्य बनी है। हनवंत के निधन की वजह से तब जोधपुर में देश का पहला उप चुनाव हुआ था। हनवंत और जुबैदा के किस्से राजस्थान के हर चुनाव में ताजा हो उठते हैं।

चुनाव में इस बार मारवाड़ राज परिवार की सक्रियता इसलिए भी नहीं है कि अभी पिछली जुलाई में हनवंत सिंह की पहली पत्नी और राजमाता पूर्व सांसद कृष्णा कुमारी का निधन हो गया। हनवंत सिंह का विवाह 1943 में ध्रांगदा की राजकुमारी कृष्णा कुमारी संग हुआ था। कृष्णा कुमारी ने जीवन में तमाम उतार-चढ़ाव देखे। हनवंत ने महाराज बनते ही इंग्लैंड की सैंडा मैकायर्ड से दूसरी शादी कर ली लेकिन, डेढ़ वर्ष के भीतर यह टूट गई। कृष्णा कुमारी अभी सैंडा के झटके से उबर भी नहीं पाई कि महाराज जुबैदा को दिल दे बैठे।जुबैदा की खूबसूरती के चर्चे आज भी होते हैं। इन झटकों के बावजूद कृष्णाल कुमारी ने राज परिवार को संभाल लिया और आज भी लोग सम्मानन से उनका नाम लेते हैं। इंदिरा गांधी ने जब राजघरानों का प्रिवीपर्स तोड़ा तब विरोध स्वरूप राजमाता कृष्णा कुमारी भी जोधपुर से लोकसभा का चुनाव लड़कर जीती थीं। वह 1977 में भी जीतीं। राजस्थान की सियासत में इस परिवार की कई पीढ़ियों का दबदबा रहा है।हनवंत और कृष्णाा कुमारी के बेटे महाराज गज सिंह 1990 में निर्दल राज्यकसभा के सदस्य चुने गये थे जबकि उनकी बड़ी बेटी चंद्रेश कुमारी 2009 में जोधपुर से सांसद बनी और मनमोहन सरकार में मंत्री भी रहीं। चंद्रेश 1984 से 1989 तक कांगड़ा से भी सांसद रहीं। वह हिमाचल प्रदेश में विधायक और मंत्री भी रहीं। गौर करें महाराज हनवंत ने 28 वर्ष की उम्र में ही 1952 में अपनी पार्टी बना ली थी और लोकसभा व विधानसभा चुनाव में अपने उम्मीदवार उतारे। उनके कई उम्मीदवार चुनाव भी जीते लेकिन, वह जीत का जश्न मना नहीं सके। 26 जनवरी 1952 को हवाई दुर्घटना में जुबैदा के साथ मारे गये। विमान दुर्घटना का कारण कभी सामने नहीं आ सका।

मारवाड़ राजभवन में एक समारोह था। सरदारपुरा के भंवरलाल बताते हैं कि मुंबई से जुबैदा नाचने के लिए बुलाई गई थीं। जुबैदा की अदाओं पर महाराज रीझ गये। पहली ही मुलाकात में उन्होंने शादी का फरमान सुना दिया। जुबैदा तलाकशुदा मुस्लिम महिला थी और महाराज के इस फरमान से राजघराने के होश उड़ गये। विरोध हुआ लेकिन, वह माने नहीं। 1950 में ब्यारवर के एक आर्य समाज मंदिर में उन्होंने जुबैदा से विवाह किया। तब जुबैदा का हिंदू नाम विद्या कुमारी रखा गया। विरोध को देखते हुए महाराज राजभवन छोड़कर जुबैदा संग मेहरानगढ़ किले में रहने लगे थे। भारत-पाकिस्ताान के बंटवारे के समय महाराज मोहम्मद अली जिन्ना के प्रभाव में थे। वह मारवाड़ रियासत का पाकिस्तान में अपनी शर्तों पर विलय करने वाले थे। इसकी भनक सरदार बल्लाभभाई पटेल को लगी तो वह सीधे राजमहल पहुंचे। पटेल के दबाव में महाराज मारवाड़ के भारत में विलय पर राजी हुए। यह इतिहास का सबसे कठिन क्षण था। पटेल की पहल से पाकिस्तान की सरहद को छूती मारवाड़ की सीमाएं भारत का अभिन्न अंग बन गईं। जयनारायण व्यास विश्वविद्यालय जोधपुर के छात्र जगतराम कहते हैं कि वह इतिहास का अद्भुत क्षण था, वरना आज भारत का नक्शा और राजनीतिक माहौल कुछ और ही होता।