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कांग्रेस को खल रही दिग्गजों की कमी

कांग्रेस को खल रही दिग्गजों की कमी, निकाय चुनाव के मौके को भी नहीं भुना सकी पार्टी

पिछले पांच वर्षों के दौरान कई कद्दावर नेताओं के पार्टी से दामन झटक लेने के बाद दिग्गजों की कमी के दौर से गुजर रही कांग्रेस दूसरी पंक्ति के नेताओं को आगे लाकर स्थापित करने के मौके को निकाय चुनाव में भुना नहीं पाई। खासकर, नगर निगमों में पार्टी का कमजोर प्रदर्शन एक बार फिर इस तथ्य को रेखांकित कर गया कि कांग्रेस के पास प्रदेशव्यापी छवि वाले नेता अब नहीं रह गए। पूर्व मुख्यमंत्री हरीश रावत को पार्टी आलाकमान द्वारा केंद्र की राजनीति में वापस बुला लेने के बाद कांग्रेस के लिए बड़े नेताओं की कमी ज्यादा गंभीर हो गई है। खासकर, चंद महीनों बाद होने जा रहे लोकसभा चुनाव के परिप्रेक्ष्य में देखा जाए तो यह आलाकमान के लिए चिंता का सबब भी है। हाल के वर्षों में उत्तराखंड में भाजपा मजबूत होकर उभरी है, तो इसका सबसे बड़ा कारण यह है कि कांग्रेस बिल्कुल शक्तिहीन होकर रह गई है। उत्तराखंड के अलग राज्य के रूप में वजूद में आने पर यहां कई दिग्गज पार्टी की ताकत बढ़ा रहे थे। हरीश रावत, विजय बहुगुणा के अलावा पूर्व केंद्रीय मंत्री सतपाल महाराज कांग्रेस की अग्रिम पंक्ति के नेताओं में शुमार किए जाते रहे। यह बात दीगर है कि इन दिग्गजों में हितों के टकराव ने पार्टी को लगातार अंतर्कलह में झोंके रखा। यही वजह रही कि जब वर्ष 2013 की केदारनाथ आपदा के बाद तत्कालीन मुख्यमंत्री विजय बहुगुणा के स्थान पर कांग्रेस ने हरीश रावत को मुख्यमंत्री बनाया तो सतपाल महाराज को यह नागवार गुजरा और वह वर्ष 2014 के लोकसभा चुनाव से ऐन पहले भाजपा में शामिल हो गए।हरीश रावत के मुख्यमंत्री रहते हुए कांग्रेस को सबसे बड़ी टूट से गुजरना पड़ा। मार्च 2016 में पूर्व मुख्यमंत्री विजय बहुगुणा व कैबिनेट मंत्री डॉ. हरक सिंह रावत के नेतृत्व में 10 विधायक भाजपा में चले गए। रही-सही कसर पूरी हो गई वर्ष 2017 में विधानसभा चुनाव के वक्त, जब दो बार प्रदेश अध्यक्ष रहे कैबिनेट मंत्री यशपाल आर्य ने भी कांग्रेस को अलविदा कहते हुए भाजपा का दामन थाम लिया। इसके बाद दिग्गजों में एकमात्र हरीश रावत ही उत्तराखंड में कांग्रेस का चेहरा बनकर रह गए लेकिन विधानसभा चुनाव में करारी शिकस्त के बाद उन्हें भी नेपथ्य में जाना पड़ा। इसके बाद प्रदेश कांग्रेस में वर्चस्व की लड़ाई शुरू हुई। पूर्व मंत्री प्रीतम सिंह को प्रदेश कांग्रेस की कमान दी गई, जबकि वरिष्ठ कैबिनेट मंत्री डॉ. इंदिरा हृदयेश ने विधानसभा में नेता प्रतिपक्ष का जिम्मा संभाला।कुछ अरसा पहले कांग्रेस आलाकमान ने हरीश रावत को सूबाई सियासत से हटाकर केंद्र में सक्रिय कर उन्हें राष्ट्रीय महासचिव का ओहदा सौंप दिया। रावत के उत्तराखंड की सियासत में सीधा हस्तक्षेप खत्म कर दिए जाने के बाद सूबे में कांग्रेस के पास ऐसे नेताओं का अकाल सा पड़ गया, जिनकी छवि प्रदेश स्तरीय हो। हालिया निकाय चुनाव को कांग्रेस ने नए नेतृत्व को उभारने और अपनी खोई सियासी जमीन वापस पाने के मौके के रूप में लिया। यहां तक कि निकाय चुनाव को लोकसभा चुनाव का पूर्वाभ्यास तक कहा गया लेकिन नतीजों ने पार्टी के मंसूबों पर पूरी तरह पानी फेर दिया।वर्तमान में राज्य की पांच में से एक सीट अल्मोड़ा में जरूर कांग्रेस के पास प्रदीप टम्टा के रूप में एक मजबूत चेहरा है लेकिन बाकी चार संसदीय क्षेत्रों में प्रत्याशियों को लेकर तस्वीर साफ नहीं। पौड़ी गढ़वाल संसदीय सीट पर पूर्व मंत्री सुरेंद्र सिंह नेगी के अलावा पूर्व विधायक गणेश गोदियाल को दावेदार बताया जा रहा है लेकिन नेगी निकाय चुनाव में कोटद्वार से बाहर निकल ही नहीं पाए, जबकि गोदियाल का पूरा उपयोग पार्टी ने किया ही नहीं। टिहरी में मौजूदा प्रदेश अध्यक्ष प्रीतम सिंह व पूर्व प्रदेश अध्यक्ष किशोर उपाध्याय दावेदार हो सकते हैं लेकिन निकाय चुनाव में कांग्रेस ने इस नजरिये से इन्हें, खासकर किशोर को सक्रिय किया ही नहीं। हरिद्वार और नैनीताल सीट पर हरीश रावत का दावा है जबकि नैनीताल में नेता प्रतिपक्ष डॉ. इंदिरा हृदयेश भी दावेदार हैं। हृदयेश भी निकाय चुनाव में हल्द्वानी से बाहर नहीं निकल पाईं।’लोकसभा प्रत्याशियों के चयन की प्रक्रिया शुरू हो चुकी है। प्रथम आकलन रिपोर्ट राज्यों से प्राप्त हो गई है। केंद्रीय नेतृत्व ने इसके लिए प्रभारी महासचिवों को जिम्मेदारी दी है, वही केंद्रीय नेतृत्व को पूरी रिपोर्ट देंगे। जिन कुछ राज्यों में विधानसभा चुनाव हो रहे हैं, वहां कांग्रेस ने भाजपा से पहले प्रत्याशी घोषित कर दिए और इस परिपाटी को लोकसभा चुनाव में भी कायम रखा जाएगा। कांग्रेस अब भाजपा से पहले लोकसभा प्रत्याशियों के नाम की घोषणा कर देगी।’