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1962 का भारत-चीन युद्ध: देश के साथ सबसे बड़े धोखे की कहानी

21 नवंबर भारत के इतिहास में इसलिए अहम है क्योंकि इसी दिन चीन ने भारत के साथ युद्ध विराम की घोषणा की थी। 20 अक्टूबर, 1962 को भारत पर चीन ने हमला किया था। इस युद्ध को 1962 के भारत-चीन युद्ध के नाम से जाना गया। भारत को कभी यह शक नहीं हुआ कि चीन हमला भी कर सकता है। इस वजह से भारतीय सेना ने सही से तैयारी भी नहीं की थी। खैर एक महीने चले इस युद्ध से भारत को बड़ा सबक मिल गया था जो बाद में भारत के काम आया। इस युद्ध से सबक लेते हुए भारत ने सेना के आधुनिकीकरण पर काम किया, बाकी नतीजा आज सबके सामने है। बहरहाल, आइए आज इस युद्ध की पूरी कहानी जानते हैं…

भारत को 1947 में आजादी मिली और 1949 में पीपुल्स रिपब्लिक ऑफ चाइना (पीआरसी) बना। शुरू के दिनों में भारत सरकार की पॉलिसी चीन से दोस्ताना रिश्तों की रही है। जब चीन ने तिब्बत पर कब्जा करने की घोषणा की थी तो भारत ने विरोध पत्र भेजकर इस मामले पर चर्चा की मांग की थी। भारत चीन से संबंध को लेकर कितना गंभीर था, यह बात कई मौकों पर साबित हुई है। भारत ने जापान के साथ एक शांति समझौता के लिए एक सम्मेलन में सिर्फ इसलिए शिरकत नहीं की क्योंकि उसमें चीन को आमंत्रित नहीं किया गया था। जब चीन दुनिया में अलग-थलग पड़ गया था, उस समय भी भारत चीन के साथ खड़ा था। 1954 में भारत और चीन के बीच शांतिपूर्ण सहअस्तित्व के लिए पांच सिद्धांतों को लेकर समझौता हुआ जिसे पंचशील समझौता कहा जाता है। उस समझौते के तहत भारत ने तिब्बत में चीन शासन को स्वीकार किया। उसी समय भारत के पूर्व प्रधानमंत्री जवाहर लाल नेहरू ने ‘हिंदी-चीनी भाई-भाई’ का नारा दिया था।

मार्च 1959 में दलाई लामा शरण लेने के लिए भारत आए तो यहां उनका जोरदार स्वागत किया गया। फिर माओ जिदोंग ने भारत पर तिब्बत में ल्हासा विद्रोह को भड़काने का आरोप लगाया। इसके बाद दोनों देशों के संबंधों में तनाव आने लगा। चीन तिब्बत पर अपने शासन के रास्ते में भारत को खतरे के तौर पर देखने लगा, जो भारत-चीन युद्ध की बड़ी वजह बना। 1959 के बाद से 1962 के बीच भारत और चीन के बीच छिटपुट संघर्ष होने लगा। 10 जुलाई, 1962 को करीब 350 चीनी सैनिकों ने चुशुल स्थित एक भारतीय चौकी को घेर लिया। चीनी सैनिकों ने लाउडस्पीकर्स पर गोरखा सैनिकों को समझाने की कोशिश की कि वे भारत के लिए नहीं लड़ें। युद्ध की शुरुआत 20 अक्टूबर, 1962 को हुई। चीन की पीपुल्स लिब्रेशन आर्मी ने लद्दाख पर और नार्थ ईस्ट फ्रंटियर एजेंसी (नेफा) में मैकमोहन लाइन के पार हमला कर दिया। युद्ध के शुरू होने तक भारत को पूरा भरोसा था कि युद्ध शुरू नहीं होगा, इस वजह से भारत की ओर से तैयारी नहीं की गई। यही सोचकर युद्ध क्षेत्र में भारत ने सैनिकों की सिर्फ दो टुकड़ियों को तैनात किया जबकि चीन की वहां तीन रेजिमेंट्स तैनात थीं। चीनी सैनिकों ने भारत के टेलिफोन लाइन को भी काट दिए थे। इससे भारतीय सैनिकों के लिए अपने मुख्यालय से संपर्क करना मुश्किल हो गया था।

पहले दिन चीन की पैदल सेना ने पीछे से भी हमला किया। लगातार हो रहे नुकसान की वजह से भारतीय सैनिकों को भूटान से निकलना पड़ा। 22 अक्टूबर को चीनी सैनिकों ने एक झाड़ी में आग लगा दी जिससे भारतीय सैनिकों के बीच काफी कन्फ्यूजन पैदा हो गया। इसीबीच करीब 400 चीनी सैनिकों ने भारतीय सैनिकों के ठिकाने पर हमला कर दिया। चीन के शुरुआती हमलों का तो भारत की ओर से मोर्टार दागकर सामना किया गया। जब भारतीय सैनिकों को पता चला गया कि चीनी सैनिक एक दर्रे में जमा हुए हैं तो इसने मोर्टार और मशीन गन से फायरिंग शुरू कर दी। इस हमले में चीन के करीब 200 सैनिक मारे गए। भारतीय सेना पूरी तरह तैयार नहीं थी, इस वजह से चीन की सेना तेजी से भारतीय इलाकों में घुसती गई। 24 अक्टूबर तक चीनी सैनिक भारतीय क्षेत्र में 15 किलोमीटर अंदर तक आ गए। 

चीन के पहले प्रधानमंत्री जो इनलाई ने इस बीच नेहरू को एक पत्र लिखकर संघर्षविराम का प्रस्ताव रखा। इनलाई ने प्रस्ताव रखा कि भारत और युद्ध समाप्त कर दें। उन्होंने दोनों पक्षों से अपनी सेना को वास्तविक नियंत्रण रेखा के 20 किलोमीटर अंदर वापस बुलाने का सुझाव भी दिया था। इनलाई ने प्रस्ताव रखा था कि चीन अरुणाचल प्रदेश (तत्कालीन NEFA-नॉर्थ ईस्ट फ्रंटियर एजेंसी) से वापस निकल जाएगा और भारत एवं चीन को अकसाई चीन पर यथापूर्व स्थिति बनाए रखना चाहिए। इनलाई ने नेहरू को एक और पत्र लिखकर यही प्रस्ताव रखे थे। लेकिन नेहरू ने चीन के प्रस्ताव को खारिज कर दिया और कहा कि अकसाई चीन पर चीन का दावा अवैध है। इसीबीच सोवियत यूनियन ने भी अपना रुख बदलते हुए चीन का समर्थन कर दिया था और कहा था कि मैकमोहन लाइन ब्रिटिश साम्राज्यवाद का खतरनाक परिणाम है।

संसद ने ‘भारत की पवित्र धरती से आक्रमणकारियों को खदेड़ने’ के लिए एक प्रस्ताव पारित किया। 14 नवंबर को फिर से दोनों देश के बीच युद्ध शुरू हो गया। फिर एक हफ्ते बाद चीन ने एकतरफा युद्ध विराम की घोषणा कर दी। लेकिन चीन ने अकसाई चीन पर कब्जा कर लिया और पूर्वोत्तर के इलाके से निकल गया। 1950 से 1962 तक भारत के संबंध
1 अप्रैल, 1950: के.एम.पानिकर को चीन में भारत का पहला राजदूत नियुक्त किया गया

नवंबर, 1950: यूएन के एक प्रस्ताव में कोरिया युद्ध में पेइचिंग को आक्रमणकारी घोषित किया गया था, भारत ने इसका विरोध किया।

6 दिसंबर, 1950: नेहरू ने यूएन में चीन की सदस्यता की वकालत की

मई, 1951: तिब्बत चीन के पूरे नियंत्रण में आ गया

15 मई, 1954: शांतिपूर्ण सहअस्तित्व पर भारत, चीन के बीच पंचशील समझौता हुआ

जून, 1954: चीन के पहले प्रधानमंत्री जो एनलाई का भारत दौरा

फरवरी, 1955: भारत ने औपचारिक रूप से ताइवान पर चीन के दावे को स्वीकारा

2 मार्च, 1955: भारत ने चीन के आधिकारिक नक्शे में पूर्वोत्तर के एक हिस्से को दिखाने पर आपत्ति जताई

नवंबर, 1956: जो इनलाई ने दूसरी बार भारत का दौरा किया

4 सितंबर, 1958: भारत ने चाइना पिक्टोरियल में उत्तरी असम और नेफा को शामिल करने पर आपत्ति जताई

23 जनवरी, 1959: जो एनलाई ने औपचारिक रूप से भारत के अंदर नेफा और लद्धाख के 40,000 वर्गमीटर पर दावा जताया

मार्च-अप्रैल-1959: दलाई लामा ल्हासा से बचकर निकल गए। दलाई लामा को शरण देने के भारत के फैसले से संबंध में खटास

25 अगस्त, 1959: लद्दाख में चीनी सैनिकों ने भारतीय चौकी पर हमला किया

8 सितंबर, 1959: चीन ने मैकमोहन लाइन को स्वीकार करने से इनकार किया

20 अक्टूबर, 1959: चीनी सैनिकों ने अकसाई चीन में गश्त कर रहे भारतीय सैनिकों पर हमला किया। भारत के 9 सैनिकों की मौत और 10 को बंदी बनाया।

7 नवंबर, 1959: जो इनलाई ने मैकमोहन लाइन के दोनों तरफ 20 किलोमीटर हटने का प्रस्ताव रखा

19 अप्रैल, 1960: नेहरू और जो इनलाई के बीच भेंट गतिरोध पर समाप्त

25 अप्रैल, 1960: विवादित क्षेत्र पर भारत के दस्तावेजी साक्ष्यों को चीन ने खारिज किया

3 जून, 1960: चीनी सैनिकों ने नेफा में भारतीय सीमा का उल्लंघन किया

31 अक्टूबर, 1961: चीन ने सीमा पर गश्त में आक्रामकता दिखाई, भारत में सैन्य दस्ते भेजे

नवंबर-दिसंबर 1961: नेहरू ने चीन की फौज को पीछे धकेलने के लिए आगे बढ़कर हमला करने की नीति अपनाई

अप्रैल 1962: चीन ने अल्टिमेटम दिया, अग्रिम चौकियों से भारतीय सैनिकों को वापस लेने की मांग की

10 जून, 1962: भारत और चीनी सैनिक लद्दाख में आमने-सामने, सशस्त्र संघर्ष टला

13 सितंबर, 1962: चीन ने फिर सीमा के दोनों तरफ दोनों फौजों को 20-20 किलोमीटर वापस लौटने का प्रस्ताव रखा

20 सितंबर, 1962: चीनी सैनिकों ने NEFA में मैकमोहन लाइन पार की, भारतीय चौकियों पर हमला

29 सितंबर, 1962: चीनी सैनिकों ने नेफा में दूसरा जोरदार हमला किया

20 अक्टूबर, 1962: चीन ने नेफा से लद्दाख तक की सीमा पर बड़े पैमाने पर हमला किया

24 अक्टूबर, 1962: चीन की ओर से तीन सूत्री संघर्षविराम प्रस्ताव

26 अक्टूबर, 1962: भारत ने राष्ट्रीय आपातकाल घोषित किया

27 अक्टूबर, 1962: नेहरू ने संघर्षविराम के प्रस्ताव को खारिज किया

15 नवंबर, 1962: पूर्वी सीमा और पश्चिमी क्षेत्र में चीन का जोरदार हमला

18 नवंबर, 1962: चीन ने नेफा में बोमडिला पर कब्जा किया

21 नवंबर, 1962: चीन ने एकतरफा संघर्षविराम की घोषणा की और अपने सैनिकों को वास्तविक नियंत्रण रेखा के 20 किलोमीटर पीछे लौटने को कहा

8 दिसंबर, 1962: चीन के प्रधानमंत्री ने फिर से तीन सूत्री प्रस्ताव भेजा जिसे भारत ने स्वीकार कर लिया

10 दिसंबर, 1962: दोनों देशों ने कोलम्बो प्रस्ताव को स्वीकार किया।